जन सहयोग से संभव है दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण

जन सहयोग से संभव है दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण

देहरादून। उत्तराखंड की दर्लभ पांडुलिपियों की खोज और संरक्षण के लिए जनता का सहयोग लिया जाएगा। विश्वविद्यालयों में संरक्षण पर आधारित कोर्स शुरू किए जाएंगे।

भारत सरकार राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन, नई दिल्ली व पुराना दरवार टिहरी ट्रस्ट की ओर से देहरादून में आयोजित सेमिनार में इसका निर्णय लिया गया। इसमें पांडुलिप संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं, विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने शिरकत की।

सेमिनार को राष्ट्रीय पांडुलिपी मिशन के उपनिदेशक डा. दिलीप कुमार ने कहा कि इस वर्ष विश्वविद्यालयों में पांडुलिपि संरक्षण से जुड़े कोर्स शुरू किए जाएंगे। जो छात्र शोध और संरक्षण का कार्य करना चाहेंगे उन्हें छात्रवृत्ति दी जाएगी।

पूर्व मुख्य सचिव एनएस नपलच्याल ने कहा कि उत्तराखंड पुरातन ज्ञान के साळा पांडुलिपियों का भंडार है। समाज की बेहतरी के लिए इनका अन्वेषण और प्रकाशन किया जाना चाहिए। पांडुलिपि विशेषज्ञ डा. देवेंद्र कुमार सिंह ने कहा कहा कि उत्तराखंड की पांडुलिपियां रखरखाव के कारण नष्ट हो रही हैं।

इसमें ज्योतिष और आयुर्वेद से संबंधित पांडुलिपियों की संख्या अधिक है। जानकी विजय और वास्तु शिरोमणि भी इसमें शामिल है। डा. प्रभाकर जोशी ने 1949 में स्व. आचार्य चक्रधर जोशी द्वारा देवप्रयाग में स्थापित नक्षत्र वेधशाला शोधकेंद्र में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों की जानकारी दी।

प्रकाश थपलियाल ने पर्वतीय अंचल में पांडुलिपि संरक्षण केंद्र बनाए जाने पर जोर दिया। पुराना दरबार टिहरी ट्रस्ट के अध्यक्ष ठाकुर भवानी प्रताप सिंह पंवार ने टिहरी रियासत की दुर्लभ पांडुलिपियों व पुरात्वातिक महत्व की धरोहर के लिए संग्राहलय बनाने पर जोर दिया।

डा. सुरेश ब्याला ने पंजाब में गुरूमुखी में लिखि पांडुलिपियों को बचाने में गुरू गोविंद सिंह के योगदान की चर्चा की। सुनील पाठक ने पदमश्री यशोधर मठपाल का संदेश पढ़ा।

ठस मौके पर साहित्यकार वीणापाणी जोशी, पूर्व सचिव डीएस गर्ब्याल, प्रदीप जैन, सविता कपूर, रजनी कुकरेती, कृष्णानंद मैठाणी, आशीष रतूड़ी, राजेश थापा, डा. विमला चमोली, राजेश शर्मा, अनुराधा आदि मौजूद थे। इस मौके पर इस क्षेत्र में सराहनीय कार्य करने वालों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन हिन्दी साहित्य समिति के अध्यक्ष डा. रामविनय सिंह ने किया।

 

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