वन अधिनियमः जंगलों की बरबादी की पटकथा

वन अधिनियमः जंगलों की बरबादी की पटकथा

DR.-S.P-Sati

                                          डा. एसपी सती
एक बार फिर उत्तराखंड राज्य के जंगलों में आग लगने के समाचार मिलने लगे हैं। गत वर्ष आग से राज्य का करीब 20 हजार हेक्टेयर जंगल स्वाह हो गया था। आग से हो रही जंगलों की बरबादी की पटकथा वन अधिनियम 1980 में छिपी हुई है।

उत्तराखंड राज्य वनां की सघनता के लिए जाना जाता है। यहां के कुल भूभाग का करीब 65-70 फीसदी भाग वन क्षेत्र है। आबादी,कृषि, विकास के लिए सिर्फ 25-30 फीसदी भूभाग है। कुछ सालों से 65-70 फीसदी वन क्षेत्र खतरे की जद में है। खतरा जंगलों में लग रही आग से है।

गत वर्ष लगी भीषण आग से राज्य के करीब 20 हजार हेक्टेयर जंगल स्वाह हो गया। वनों के आग से हो रहे विनाश की वजह कानून, व्यवस्था और कुछ प्रकृतिजन्य बदलाव प्रमुख रूप से शामिल है। इन कारकों का सामधान करने पर व्यवस्था गौर करने को तैयार नहीं है।

वन अधिनियम 1980 ने वनों से लोगों को अलग कर दिया। वन कानून ने लोगों का वनों के साथ भावनात्मक लगाव समाप्त कर दिया। इसके अलावा 1000 मीटर की ऊंचाई पर पेड़ों के कटान पर प्रतिबंध से चीड़ खूब फूल फूल रहा है। चीड़ की पत्तियां जंगल में लग रही आग में घी का काम कर रही हैं। चौड़ी पत्ती वाले पेड़ जंगलों से तेजी से समाप्त हो रहे हैं।

पिछले तीन दशकों में मार्च से मई के बीच जंगलों में आग लगने की घटनाओं की पृनरावृत्ति हो रही है। मौसम में बदलाव की वजह से जंगल की आद्रता घट रही है। सर्दियों में बारिश में कमी से स्थिति और बिगड़ रही है।

जमीन की नमी में कमी आने की वजह से मार्च-मई के बीच जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे तमाम प्रकार के नुकसान देखने को मिल रहे हैं। वन संपदा तो नष्ट हो ही रही है। भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। आने वाले दिनों में तराई से लेकर पहाड़ी क्षेत्रों में इसका व्यापक असर देखने को मिलेगा।

जैवविविधता की सघनता प्रभावित हो रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में भूक्षरण तेती से बढ़ रहा है। कुल मिलाकर उत्तराखंड में वनाग्नि बड़ी त्रासदी बन रही है। सरकारों के स्तर से अभी तक इस मामले में गंभीरता देखने को नहीं मिल रही है।

वनों की आग बुझाने में अब ग्रामीणों का साथ नहीं मिल रहा है। ऐसा वन कानून की वजह से हो रहा है। हालात ये है कि वनों को आग से बचाने के लिए अंग्रेजी हुकुमत में की गई व्यवस्थाओं से भी सरकार कुछ सीखने को तैयार नहीं है। तब जंगलों को आग से बचाने के लिए तमाम कारगर कदम उठाए गए थे।

1980 जैसा वन अधिनियम 1920 में अंग्रेजों के शासन के दौरान भी आया था। इस कानून में भी मानवीय हस्तक्षेप को कम करने की उददेश्य से लोगों को जंगलों से दूर किया गया था। इस कानून के लागू होते ही जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ गई थी।
क्हा जा सकता है कि 1920 के अनुभवों से भी आज की व्यवस्था सबक लेने को तैयार नहीं है। कुल मिलाकर राज्य में जंगलों के आग से बरबाद होने का क्रम नहीं थमा तो उत्तराखंड ग्रीन बोनस की मांग का हक भी खो देगा। यही नहीं राज्य की खास आबोहवा की विशिष्टता बीते जमाने की बात बन जाएगी।

लेखक एनएनबी केंद्रीय विवि के भूगर्भ विभाग में प्रोफेसर हैं।

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