पहाड़ को जीते हैं लोक गायक संजय किशन ध्यानी

पहाड़ को जीते हैं लोक गायक संजय किशन ध्यानी

ऋषिकेश। पहाड़ की खैरी( दुख ), उल्यार-मौल्यार, हौंशियापन और निपलटी ( पलायन) को स्वर देने वाले प्रख्यात लोक गायक संजय किशन ध्यानी वास्तव में पहाड़ को जीते हैं।

प्रख्यात लोक गायक/कवि संजय किशन ध्यानी के गीत रचनाओं में ठेठ पहाड़ की मौलिकता झलकती है। गित्येरों की भीड़ में यही बात उन्हें सबसे अलग रखती है। उनकी एक-एक रचना में शत प्रतिशत मौलिकता और संदेश हैं।

इन संदेशों को लक्षित वर्ग तक पहुंचाने के उनके प्रयास काबिलेतारीफ हैं। राज्य के पलायन, पुरखों की संजोकर रखी गई कूड़ी पुंगड़ी के बांझा पड़ती तस्वीर, पहाड़ के लोगों की खैरी( दुख ) हर्ष, जवानी को लेकर उन्होंने एक से बढ़कर एक रचनाएं प्रस्तुत की हैं।

उत्तराखंड के आज के युवाओं की मनोदशा को ताड़ते हुए उनका ढाई तोला की नथुली गीत जल्द आने वाला है। उनकी भजन रचनाएं देवभूमि उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व करती हैं।

मूल रूप से देवप्रयाग के कोठी गांव निवासी संजय किशन ध्यानी छात्र जीवन से ही इस विद्या का प्रतिनिधित्व करते हैं। श्री रघुनाथ कीर्ति इंटर कालेज के सांस्कृतिक सौपान हों या फिर देवप्रयाग की रामलीला हर जगह संजय की दमदार उपस्थिति होती थी।

वर्ष 1996 में पहली ऑडियो कैसेट के माध्यम से वो संगीतकारों की नजर में आए। ऑल इंडिया दिल्ली में भी उन्होंने कार्यक्रम दिए।

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