उत्तराखंड देवस्थानम एक्ट किसके दिमाग की उपज

उत्तराखंड देवस्थानम एक्ट किसके दिमाग की उपज

- in धर्म-तीर्थ
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पं. माधव प्रसाद भट्ट।
देवभूमि उत्तराखंड के चारधाम समेत 51 मंदिरों पर लागू किया गया देवस्थानम एक्ट/श्राइन एक्ट आखिर किसके दिमाग की उपज है। ये सवाल देश भर के धर्मानुरागियों को परेशान किए हुए है।

हिमालय स्थित उत्तराखंड के चारों धामों के कपाट अक्षय तृतीय के साथ खुलने शुरू हो जाएंगे। देश-विदेश से श्रृद्धालुओं के आने का क्रम शुरू हो जाएगा। भू बैकुंठ धाम से लेकर सभी धामों की यात्रा में इस बार सरकार छाप दिखेगी। कारण उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने आदिधाम श्री बदरीनाथ, श्री केदारनाथ, श्री गंगोत्री, श्री यमुनोत्री समेत 51 मंदिरों की व्यवस्था श्राइन एक्ट यानि देवस्थानम एक्ट के तहत होगी।

इस एक्ट पर देश भर के धर्मावलंबियों के बीच चर्चा हो रही है। सवाल उठ रहा है कि आखिर देवभूमि उत्तराखंड में देवस्थानम एक्ट किसके दिमाग की उपज है। इससे भाजपा सरकार क्या हासिल करना चाहती है। इसके पीछे मंतव्य क्या है। क्या स्थापित परंपराए एक्ट के बाद अक्षुण्य रह सकेंगी। इसको लेकर तीर्थ पुरोहित लगातार सवाल खड़े करते रहे हैं।

प्रचंड बहुमत के घमंड में सरकार तीर्थ पुरोहित हक हकूकधारियों की आशंकाओं को तवज्जो देने को तैयार नहीं है। ऐसे में सवाल उठने लाजिमी हैं। आखिर भाजपा सरकार को चारधामों की यात्रा व्यवस्था में क्या खामी दिखी। 1939 का श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर एक्ट को रदद करने की क्या जरूरत पड़ी। भाजपा सरकार इसे आज दिन तक बताने को तैयार नहीं है।

उत्तराखंड सरकार ने इस एक्ट को लागू करने में इतना उवावलापन क्यों दिखाया। आखिर धामों के तीर्थ पुरोहितों और हक हकूकधारियों ने एक्ट पर चर्चा से सरकार क्यों कतराती रही। एक्ट को लेकर पैदा हुई आशंकाओं पर चर्चा को मुख्यमंत्री, मंत्री या कोई आलाधिकारी क्यों सामने नहीं आ रहा है। आरएसएस इस पर चुप्पी साधे हुए है। आखिर इसके पीछे राज क्या है।

ये सब सवाल धर्मानुरागियों को परेशान किए हुए हैं। उत्तराखंड से बाहर इसकी ज्यादा चर्चा हो रही है। इस मामले में खास बात ये देखी गई कि उत्तराखंड की भाजपा सरकार सिर्फ एक ही रटट क्यों लगा रही है कि धामों में बेहतर सुविधाएं जुटाने के लिए एक्ट लाया गया।

सरकार के इस दावे में दम नजर नहीं आ रहा है। विकास और धामों की बेहतरी का इस एक्ट से दूर-दूर तक लेना देना नहीं है। बगैर इस एक्ट के भी सरकार धामों की बेहतरी के लिए काम कर सकती है। भला इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है।

दरअसलख् यहीं से देवस्थानम एक्ट पर सवाल खड़े होते हैं। सरकार की मंशा पर संदेह पैदा होते हैं। परिणाम तमाम बातें एक के बाद एक सामने आ रही हैं। देश के धर्मानुरागियों के मन में ये सवाल भी पैदा हो रहा है कि आखिर उत्तराखंड के चार जिलों के मंदिरों को ही एक्ट के दायरे में क्यों लाया गया।

मठ-मंदिरों के गढ़ हरिद्वार को क्यों अलग रखा गया। पौड़ी जिले के नीलकंठ को क्यों छोड़ा गया। जबकि नीलकंठ में हर वर्ष पांच करोड़ से अधिक श्रृद्धालु आते हैं। क्या उत्तराखंड की भाजपा सरकार नीलकंठ आने वाले श्रृद्धालुओं के लिए चिंतित नहीं है।

कपाट खुलने पर भाजपा को इन सवालों से दो-चार होना पड़ेगा। तीर्थ पुरोहितों हक हकूकधारियों के अलावा देश भर से आने वाले श्रृद्धालु भी जरूर सवाल करेंगे। स्वयं को हिन्दु धर्म का झंडाबरदार समझने वाले आरएसएस को भी जवाब देना होगा। आखिर उत्तराखंड के चार धामों की स्थापित परंपराओं पर एक्ट थोपने पर संघ चुप्पी क्यों साधे हुए है।

भाजपा को देश को बताना होगा कि निजीकरण की पक्षधर मोदी सरकार की छत्रछाया में त्रिवेंद्र सरकार उत्तराखंड के मंदिरों का सरकारीकरण क्यों कर रही है। मंदिरों पर सरकार का लेबल क्यों लगाना चाहती है।

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