आया मौसम मम्मी-पापा के परेशान होने का

आया मौसम मम्मी-पापा के परेशान होने का

pubलाडले को पाठशाला भेजने की  तैयारी कर रहे मम्मी-पापा के पशान होने का मौसम आ गया। एडमिशन के लिए दौड़ धूप शुरू हो गई। स्कूल हैं कि फार्म देने में भी भाव खा रहे हैं।

हर घर में खुशहाली लेकर आई खुली बाजार व्यवस्था अब लोगों को शिक्षा के मंदिर में रूला रही है। यहां खुली बाजार व्यवस्था का ऐसा चटक रंग चड़ा है कि लोग कराहते हुए इस रंग में रंगने को आतूर हैं। परिणाम स्कूल दुकान में तब्दील हो गई, छात्र ग्राहक और शिक्षा माल बनकर रह गई है।

आम आदमी के स्तर से आरोप-प्रत्यारोप कुछ भी लगें शिक्षा की इस व्यवस्था को सभी आत्मसात कर चुके हैं। इन दिनों स्कूलों में नए एडमिशन की तैयारियां चल रही हैं। साथ ही नए शिक्षा सत्र में बढ़ी हुई फीस अभिभावकां के पसीने छुड़वा रही है।

लाडले के एडमिशन के लिए मां-बाप ने दौड़ धूप शुरू कर दी है। एडमिशन करा सकने वाले हर द्वार पर मां-बाप दस्तक दे रहे हैं। मंत्री, सांसद और विधायकों तक से एप्रोच कराई जा रही है। कहीं कोई चूक न हो जाए इसके लिए एक नहीं कई स्कूलों में ट्राई किया जा रहा है।

घर पर तैयारी के नाम पर बच्चे की शामत आई हुई है। स्कूलों ने भाव खाने शुरू कर दिए हैं। मोल-भाव से लेकर प्रवेश परीक्षा का भी खूब हौवा ख़ा किया जा रहा है। अभिभावक हर दबाव को झेलने को तैयार दिख रहा है। यानि लाडले के एडमिशन से पहले ही तमाम समझौते करने को हर कोई तैयार है। कहा जा सकता है कि लाडले के एडमिशन की जंग जीतने के बाद स्कूलों की मनमानी चुपचाप सही जाएगी। स्कूलों के इशारे वाली दुकानों से ही पेन-पेंसिल, जूता-जुराब, कॉपी-किताब और कप़े-लत्ते खरीदे जाएंगे।

 

सरकारी स्कूलों पर भरोसा करके तो देखो 
नौकरी सरकारी, रियायत सरकारी की चाहत रखने वाले लोगों का न जाने क्यों सरकारी स्कूलों पर भरोसा नहीं है।
लोगों को लाडले के एडमिशन को पब्लिक स्कूलों के धक्के खाने मंजूर हैं। मगर, बेहद योग्य शिक्षकों वाले सरकारी स्कूल जाना पसंद नहीं है। उल्टे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई न होने जैसे भ्रम फैलाए जा रहे है।
सच ये है कि अब सरकारी स्कूलों में भी दर्जा एक से अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है। मॉडल स्कूल बेहतर कर रहे हैं।

 

पब्लिक स्कूलों पर नहीं सरकार का जोर
पब्लिक स्कूलों पर सरकार का कतई जोर नहीं है। स्कूल सरकार का मुंह चिड़ाने तक का मौका नहीं चूकते।
उम्मीद की जा रही थी कि आरटीई से पब्लिक स्कूलों पर लगाम लगेगी। मगर, इसके आशातीत परिणाम देखने को नहीं मिले। अभी भी पब्लिक स्कूलों की हर स्तर पर मनमानी चल रही है। हालात ये है कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों की पत्रों का तक स्कूल जवाब नहीं देते।

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