उत्तराखंड के राज्य पुष्प ब्रह्म कमल को संरक्षित करने की आवश्यकता

उत्तराखंड के राज्य पुष्प ब्रह्म कमल को संरक्षित करने की आवश्यकता

- in उत्तरकाशी
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डॉ अशोक कुमार अग्रवाल। 
देवभूमि उत्तराखंड के प्रतीक पुष्प ब्रह्म कमल को संरक्षण की दरकार है। तमाम गुणों की वजह से हो रहे अत्यधिक दोहन और तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन ने इस पर संकट खड़ा कर दिया है। इस पर गौर करने की जरूरत है।

ब्रह्म कमल साढ़े तीन हजार से से पांच हजार मीटर की ऊंचाई और काफी कम तापमान में पाया जाता है। एक तरह से यह फूल उस स्थान पर पाया जाता है जहां पेड़ पौधों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।भारत में इसकी लगभग 61 प्रजातियां पाई जाती हैं। जिनमें से लगभग 56 प्रजातियां अकेले हिमालय क्षेत्रों में पाई जाती हैं हिमालय को छोड़कर यह दूसरे स्थानों पर भी नहीं हो सकता।

ब्रह्मकमल का पौधा उच्च हिमालई क्षेत्रों में बर्फ पिघलने के साथ उगना शुरू होता है और इस पर फूल अगस्त में खिलते हैं। इस पौधे का जीवनकाल छह माह का होता है। ब्रह्मकमल का वानस्पतिक नाम सोसुरिया अब्वल्टा है यह अस्टेरेसि कुल का पौधा है। इसका नाम स्वीडिश वैज्ञानिक डॉ सोसुरिया के नाम के नाम पर रखा गया था।इस कूल के अन्य पौधे सूर्यमुखी, गेंदा, गोभी, डहेलिया, कुसुम एवं भृंगराज हैं।

हालांकि इसका नाम ब्रह्मकमल है लेकिन यह पानी में ना होकर जमीन में पैदा होता है। इस फूल के संरक्षण एवं महत्व को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने इसे राज्य पुष्प का दर्जा दिया। ब्रह्मकमल हिमालय की वादियों में खिलता है और सिर्फ रात में ही खिलता है सुबह होते ही फूल अपने आप बंद हो जाता है अपनी विशेषताओं की वजह से यह दुनिया भर में लोकप्रिय है ब्रह्मकमल के पौधे में एक साल में केवल एक ही बार फूल आता है जो सिर्फ रात्रि में खिलता है।

दुर्लभता के इस गुण के कारण ब्रह्मकमल को अति शुभ माना जाता है। ब्रह्मकमल औषधीय गुणों से भी परिपूर्ण है इस फूल की विशेषता है कि जब यह खिलता है तो इसमें ब्रह्म देव तथा त्रिशूल की आकृति बनकर उभर आती है इस पुष्प को देवताओं का प्रिय पुष्प माना जाता है।

इसका खिलना रात में आरंभ होता है तथा 10ः00 से 11ः00 बजे तक यह पूरा खिल जाता है तथा मध्य रात्रि से इस फूल का बंद होना शुरू हो जाता है और सुबह तक यहां मुरझा चुका होता है । ब्रह्मकमल को अलग-अलग जगहों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे उत्तराखंड में ब्रह्मकमल, हिमाचल में दुदा फूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर पश्चिम भारत में बरगंडाटोगस के नाम से भी जाना जाता है। ब्रह्मकमल भारत के उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और कश्मीर में पाया जाता है।

भारत के अलावा यह नेपाल, भूटान, म्यांमार व पाकिस्तान में भी पाया जाता है। उत्तराखंड में पिंडारी, सिपला, रूपकुंड, हेमकुंड, फूलों की घाटी, केदारनाथ, केदार कांठा, हर की दून, टोंस वैली आदि दुर्गम स्थानों पर पाया जाता है। इस फूल के कई औषधीय उपयोग हैं इसके राइजोम में एंटीसेप्टिक होता है जिसका उपयोग हिमालई क्षेत्रों में रहने वाले लोग जलने व कटने में करते हैं साथ ही इसका उपयोग सर्दी जुकाम आदि में भी किया जाता है।

इस पुष्प को सुखा कर कैंसर रोग की दवाई के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। जानवरों में मूत्र संबंधी समस्या के लिए इस फूल को जौ के आटे में मिलाकर खिलाया जाता है। गर्म कपड़ों में इसका फूल डाल कर रखने पर कपड़ों में कीड़ा नहीं लगता है। उच्च हिमालई क्षेत्रों के लोग गांव में कोई रोग व्याधि ना हो के लिए इस पुष्प को घर के दरवाजे पर लगाते हैं। इस फूल की धार्मिक मान्यता भी है ब्रह्मकमल दो शब्दों से मिलकर बना है ब्रह्मा और कमल यह ब्रह्मा जी का प्रिय पुष्प है।

जलवायु में परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण इस दिव्य पुष्प पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं वैसे ही यह पुष्प संकटग्रस्त श्रेणी में है। ब्रह्मकमल का बहुत अधिक मात्रा में दोहन होने से इसके अस्तित्व पर खतरा बन गया है और यह दुर्लभ पुष्प विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है।

इस फूल को संरक्षित करने की आवश्यकता है इसके लिए हम सभी को प्रयास करने होंगे। वनस्पति विज्ञान के लैब सहायक श्री सुखदेव सिंह नेगी जी, जो कि उस क्षेत्र के रहने वाले हैं उनके साथ उत्तरकाशी के उच्च हिमालई क्षेत्रों में जाने का अवसर प्राप्त हुआ जहाँ पर हमने देखा की सितंबर तक खिलने वाला ब्रह्मकमल अक्टूबर में भी खिला हुआ है।

मेरा मानना है कि कोरोना संक्रमण के दिशा निर्देश के कारण वातावरण में आए बदलाव व प्रदूषण ना होने होने के कारण ब्रह्मकमल प्रजाति के पुष्प के लिए संजीवनी का काम किया है जो इस दुर्लभ प्रजाति के फूल के लिए शुभ संकेत हैं इस बार बुग्यालों में मानवीय आवाजाही नहीं होने से ब्रह्म कमल का दोहन नहीं हो पाया।

पहले ट्रैकिंग पर गए पर्यटक ब्रह्मकमल को परिपक्व होने से पहले ही तोड़ देते थे जिससे उसका बीज नहीं फैल पाता था इस बार फल पूरी तरह से पक चुके हैं और उसका बीज गिरने पर अगले बार इस फूल की पैदावार बढ़ने की संभावना है। मेरा मानना है कि इस पुष्प के बीजों को संरक्षित करने के उपरांत उच्च हिमालई क्षेत्रों में वन विभाग के सहयोग से छोटी-छोटी नर्सरी बनाकर इस फूल को संरक्षित किया जा सकता है।
लेखक गवर्नमेंट कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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