आध्यात्म और वर्जनाओं को समेटे है ब्रहम कमल पुष्प

आध्यात्म और वर्जनाओं को समेटे है ब्रहम कमल पुष्प

हेमलता बहन। 
उच्च हिमालीय क्षेत्र में उगने वाले वाले ब्रहम कमल पुष्प आध्यात्म और वर्जनाओं को समेटे हुए है। इस पुष्प को तोड़ने और देव पूजा-अर्चना में उपयोग करने से पहले तमाम वर्जनाओं का अनुसरण करना होता है। ये परंपरा वर्षों वर्ष से चली आ रही है।

राज्य गठन के बाद ब्रहम कमल को राज्य पुष्प का दर्जा हासिल हुआ। मगर, इसे आध्यात्मिक दर्जा पहले प्राप्त था। इन दिनों सावन का महीना चल रहा है। रूद्रप्रयाग जनपद के विकासखंड ऊखीमठ की मध्यमहेश्वर घाटी में रांसी गांव के राकेश्वरी माँई के मंदिर में सावन लगते ही श्रीकृष्ण, बाला भगवान. के जागर दो माह तक गाए जाते हैं।

रात्री आठ बजे से दस बजे तक.. श्री कृष्ण लीलाओं का मंचन भी किया जाता है। बचपन से इस आध्यात्मिक और ज्ञानवर्धक प्रस्तुतियां देखती आ रही हूँ। इसी में एक अध्यात्मिक विषय है जागर के दौरान प्रथम 15 दिन में जया, विजया और थुनेर के फूल सोलटे (रिंगाल की कंडडी) में माँ राकेश्वरी के मंदिर से लगभग 25 से 30 कि मी. ऊंचाई पर के पास ब्रहम कमल लेने रांसी के खोयाल जाति के लोग जाते हैं।

ब्रहम कमल लेने जाने वाले लोगों को स्थापित वर्जनाओं का अनुपालन किया जाता है। नहा धोकर कर. निराहार रह कर. धोती पहनना अनिवार्य होता है। जो फूलारी व्यक्ति होते हैं उनके पास शंख होना अनिवार्य होता है। मान्यता है कि बिना शंख के फूलारी रास्ता भटक जाते हैं।

दरअसल, यह शंख क्षेत्र पाल देवता के मंदिर रास्ते में जहां जहां वनदेवता के छोटे छोटे मंदिर (मल्ला) होते हैं वहां वहां पर शंखनाद किया जाता है। फूलों को लेने जाते हुए फलाहार करते हैं। सिर्फ रात्री को भोजन करते हैं। सन्यारा में माँ भगवती के मंदिर के पास जाकर शंख बजाना और उस स्थान पर रुकना अनिवार्य होता है। एक फूलारी के पास शंख. पानी. गोमूत्र (गौन्त) का साथ में होना अनिवार्य होता है।

जब किसी स्थान पर फूलारी को कुछ फल खाने या चाय पीने की जरूरत होती है तो वह फूलों को किसी ऊंचे पत्थर के ऊपर या पेड़ के ऊपर फूलों को रख देता है।

फिर फलाहार के बाद हाथ मुँह धोकर. (गौन्त) गोमूत्र से कुल्ला करेगा तब फूलों को पुनः उठाएगा। ये भी ध्यान रखना कोई कीड़ा. पक्षी. या हड्डी पर छू ना पाए। . श्री कृष्ण के जागर के उपरांत प्रसाद के रूप में सर्व प्रथम मंदिर में चढ़ाए जाते हैं. फिर सभी लोगों को प्रसाद के तौर पर बांटे जाते हैं।

ये बरसों से परम्परा चली आ रही है. अध्यात्मिक और प्रकृति का अनूठा मेल है.। सावन भादो दो माह के जागर के समापन के बाद असूज माह के दो गते (औंचकनी) का मेला लगता है उस समय अधिक फूलों की आवश्यकता होती है तब पीठ में पूरा बोझ बना कर फूलों को लाया जाता है।

फूलारी बताते हैं कि इन फूलों की गंध बहुत तेज होती है. यंहा तक कि फूल तोड़ने के लिए कपड़े की आवश्यकता होती है..उसका बहुत ध्यान रखा जाता है.. सिला समुद्र और द्वारा स्थानों से फूल लाए जाते हैं.. इसमें एक और अनिवार्य नियम है जनेऊ धारण अनियार्य है।

देवभूमि कहलाने के कई कारणों में ये सुंदर अध्यात्मिक परम्परा रोमांच और प्राकृतिक जानकारी की यात्रा है.. एक या दो लोग इसमें जाते हैं.. ये जो फूलों का इलाका है ये मनड़ा माँई का क्षेत्र है.. जहां से फूल लाए जाते हैं उस स्थान को सिला समुद्र और द्वारा कहा जाता है।

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