भारत देश के जर्रे-जर्रे में है अनेकता में एकता

भारत देश के जर्रे-जर्रे में है अनेकता में एकता

- in देहरादून
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डा. अफरोज इकबाल।
भारत देश के संदर्भ में अनेकता में एक एकता शब्द भर नहीं हैं। बल्कि ये भारत के जर्रे-जर्रे में समाहित है। ये हर किसी को समाहित कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाली संस्कृति है।

भारत के विभिन्न प्रदेशों भाषा , रहन – सहन , खान – पान , वेश – भूषा , प्रथा , परम्परा , लोकगीत , लोकगाथा , विवाह – प्रणाली , जीवन – संस्कार , कला , संगीत तथा नृत्य में भी हमें अनेक रोचक व आकर्षक भेद देखने को मिलते हैं। वेद , उपनिषद् , गीता , रामायण , कुरान , बाइबल और ग्रन्थ साहब सबको माथे से लगाया जाता है।

यहाँ शास्त्रीय संगीत , लोक संगीत केसाथ – साथ फिल्मी संगीत व रीमिक्स संगीत आदि का प्रसार संगीत की विविधता को दर्शाते हैं । यहाँ भरत – नाट्यम , कथकली , कथक , भाँगड़ा आदि विभिन्न प्रकार के नृत्य मिलते हैं । कला क्षेत्र में तुर्की , ईरानी , भारतीय व पाश्चात्य चित्रकला , मूर्तिकला व वास्तुकला के विविध रूप देखने को मिलते हैं ।

यही भारतीय संस्कृति की प्रकृति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है । यही भारतीय संस्कृति व समाज में पाई जाने वाली विभिन्नताएँ अथवा विविधताएँ हैं ।भारतीय संस्कृति की विशेषताओं में प्रधान है – कर्म प्रधानता , आध्यात्मिकता , प्राचीनता , अमरता , चिन्तन की स्वतन्त्रता , सामूहिक कुटुम्ब प्रणाली , ग्रहणशीलता , विश्व कल्याण की भावना , सहिष्णुता और उदारता तथा सबसे प्रधान विशेषता है – अनेकता में एकता।

पाश्चात्य विद्वान इस विशेषता को मात्र ‘ शब्द का जादू ’ ही मानते हैं । पर डॉ ० राधा कुमुद मुकर्जी ने “ भारत की आधारभूत एकता “ में ठीक ही लिखा है , “ भारतवर्ष सम्प्रदायों और रीति – रिवाजों , धर्मों एवं सभ्यताओं – विश्वासों और बोलियों , जातीय प्रकारों और सामाजिक व्यवस्थाओं का एक आजायबघर है । पर इन सारी भिन्नताओं के होते हुए भी भारतीय संस्कृति में मूलभूत एकता है ।

“ रिजले लिखते हैं कि , “ भौतिक और सामाजिक भाषायी परम्पराओं और धार्मिक वैविध्य के अन्तर में भारत के जीवन में हिमालय से कैमोरिन तक एक एकता देखने को मिलती है । “ बाह्य विभिन्नताओं के होते हुए भी भारतीय संस्कृति में मौलिक एकता पाई जाती है । यह एकता कोई हाल की घटनाओं या ब्रिटिश शासन का परिणाम नहीं मानी जा सकती बल्कि सांस्कृतिक एकता उतनी ही प्राचीन है जितनी कि भारतीय संस्कृति।

सांस्कृतिक एकता का आदर्श बहुत पुराना है और सबकी रग – रग में समाया हुआ हैं भारतीय संस्कृति को जन्म देने वाले ऋषि – मुनि भारत की एकता से पूरी तरह परिचित थे । विभिनन क्षेत्रों में इस एकता के दिग्दर्शन से यह बात और भी स्पष्ट हो सकती है ।

भारत की भौगोलिक एकता इस देश के लोगों में एक प्रकार की एकानुभूति उत्पन्न करती रही है । यहाँ के निवासी भारत के पर्वतों , जंगलों , नदियों और पुरियों को पवित्र मानते हैं ; गंगा , यमुना , गोदावरी , सरस्वती , नर्मदा , सिन्धु और कावेरी – ये सात नदियाँ भारत के सब हिन्दुओं के लिए पवित्र हैं ।

भारत के बौद्धिक नेताओं ने भी भारत की इस भौगोलिक एकता को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था । यही कारण है कि केरल राज्य में उत्पन्न हुए आद्यगुरू शंकराचार्य ने अपने विविध मठों की स्थापना – उत्तर , दक्षिण , पूर्व , पश्चिम – सर्वत्र की थी । इस दशा में यदि भारत के विभिन्न निवासी इस देश के प्रति ममता और एकता की भावना रखें , तो यह स्वाभाविक ही है ।

भारतीय संस्कृति इस देश में आकर बसने वाली अनेक जातियों की संस्कृतियों के मेल से तैयार हुई है और अब यह पता लगाना बहुत कठिन है कि उसमें किस जाति का कितना अंश अवशेष है । “ आर्य संस्कृति समस्त भारत पर शासन करती है और हमारे भूगोल , जाति तथा राजनैतिक इतिहास द्वारा निर्मित विभिन्नता के होने पर भी इसने भारत को आन्तरिक ऐक्य प्रदान किया है । “

भारतवर्ष में भाषाओं की बहुलता है , परन्तु महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सभी भाषाएँ एक ही सांचे में ढली हुई प्रतीत होती है । अधिकांश भाषाओं की वर्णमाला एक ही है , सभी भाषाओं पर संस्कृत भाषा का प्रभाव देखने को मिलता है जिसके फलस्वरूप भारत की प्रायः सभी भाषाएँ बहुत अर्थों में समान हैं।

सांस्कृतिक एकता भारत की एक विशेषता है । इस देश में न केवल हिन्दू अपितु मुसलमान , पारसी और ईसाई भी एक ही संस्कृति के रंग में रंगे हुए हैं । यह संस्कृति वैदिक , बौद्ध , जैन , हिन्दू , मुस्लिम और आधुनिक संस्कृतियों के सम्मिश्रण से बनी है । भारत के मुसलमान अपने विचारों , रीति – रिवाजों व अभ्यासों की दृष्टि से अरब व टर्की के मुसलमानों से बहुत भिन्न हैं ।

भारत के बहुसंख्यक मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू ही थे । इसी प्रकार आन्ध्र , चेन्नई , कोलकाता , गुजरात आदि में विभिन्न भाषा – भाषी जो जन – समुदाय निवास करते हैं , वे सब एक ही संस्कृति के अनुयायी हैं । राम और कृष्ण के आदर्श , अर्जुन और भीम की वीर – गाथाएँ व नानक और तुलसी के उपदेश उन्हें समान रूप से प्रभावित करते हैं।

संस्कृति की यह एकता ऐसी है जो नस्ल , भाषा आदि के भेद की अपेक्षा अधिक महत्त्व की है । इसी के कारण सम्पूर्ण भारतीय अपने को चीनी , ईरानी , अरब , अंग्रेज आदि अन्य राष्ट्रीयताओं से भिन्न समझते हैं , और अपने को एक मानते हैं । भारत में विश्व की सबसे बड़ी लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था है।

इस प्रकार भारतीयों के समक्ष भारत की एकता की कल्पना सदैव मूर्तिमान रही है ।भारत के विभिन्न भागों के सामाजिक जीवन में भी साम्य है । संयुक्त परिवार की प्रथा सर्वत्र प्रचलित है । जाति प्रथा का प्रभाव किसी – न – किसी रूप में भारत के सभी लोगों पर पड़ा है । रक्षाबन्धन , दशहरा , दीपावली , होली आदि त्योहारों का फैलाव समूचे भारत में है ।

इसी प्रकार सारे देश में जन्म – मरण के संस्कारों व विधियों , विवाह – प्रणालियों , शिष्टाचार , आमोद – प्रमोद , उत्सव , मेलों , सामाजिक रूढ़ियों और परम्पराओं में पर्याप्त समानता देखने को मिलती है । भारतीय जीवन में कला की एकता भी कम उल्लेखनीय नहीं है ।

स्थापत्य कला , मूर्तिकला , चित्रकला , नृत्य , संगीत आदि के क्षेत्र में हमें एक अखिल भारतीय समानता देखने को मिलती है । इन सभी क्षेत्रों में देश की विभिन्न कलाओं का एक अपूर्व मिलन हुआ है । देश के विभिन्न भागों में बने मन्दिरों , मस्जिदों , चर्चों तथा इमारतों में इस मिलन का आभास होता है ।

शास्त्रीय संगीत हो , क्षेत्रीय संगीत हो , लोकगीत हो , फिल्मी संगीत हो , पॉप म्यूजिक हो या रीमिक्स हो , रेडियो , सिनेमा व टेलीविजन के माध्यम से उसका विस्तार सारे भारतवर्ष में होता है । अतः हम कह सकते हैं कि कला के क्षेत्र में भी भारत में मौलिक एकता है।

1 Comment

  1. Very nice 👌

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