…. और डा. भारतीय ने मुझे मां के दर्शन करा दिए

…. और डा. भारतीय ने मुझे मां के दर्शन करा दिए

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सुदीप पंचभैया

मै उन अभागों में से हुं जिसने जन्म के बाद मां का मुंह नहीं देखा। जन्म के कुछ दिनों बाद मां का देहावसान हो गया था। इस बात की कसक आज तक है। किशोर अवस्था में कुछ ज्यादा ही थी। इससे जीवन कई तरह से प्रभावित हुआ।

खैर, जीवन अपनी गति से बढ़ रहा है। छोटी-बड़ी मौसियों को देखकर मै बचपन में अपनी मां की सूरत को उकेरने का प्रयास करता था। इसी दौरान 1980 के दशक में सिराला में एक विवाह समारोह में मेरी मुलाकात डा. जितेंद्र भारतीय से हुई। तब मेरी उम्र छह साल की थी। डा. भारतीय मेरे बड़े मौसा जी थे और लखनउ में रहते थे।

उनके बारे में काफी कुछ सुना था। मसलन, वो डिग्री कॉलेज में पढ़ाते हैं, किताबें लिखते हैं, बड़े तांत्रिक हैं, उनके पास सत्ता से जुड़े बड़े-बड़े नेता आते हैं आदि आदि। ये बात बहुत छोटी उम्र से में घर में बड़ों के मुंह से सुनता रहा। बहरहाल, मुलाकात में उन्हें मेरी चपलता भा गई। मेरे बारे में किसी से पूछा। जब उन्हें पता चला कि मै लक्ष्मी का सबसे छोटा बेटा सुदीप हूं तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया।

बाहरी चपलता के बावजूद उन्होंने मेरे बाल मन के शून्य को ताड़ लिया। सुबह के समय मुझे फिर बुलाया और तमाम बातें पूछने लगे। इसी दौरान उन्होंने मां के बारे में भी पूछ लिया। इस पर मेरी चुप्पी और निराशा के के बाद उन्होंने कहा कि अपनी मां को देखोगे तो मै हक्का बक्का इधर उधर देखने लगा।

उन्होंने थोड़ा सा सरसों का तेल अपने दायं हाथ की हथेली में लिया और मुझे कहा कि गौर से देखो। इस तेल में जो आकृति मुझे दिखी वो आज तक मेरे मस्तिष्क में है। आकृति मेरी मां की थी। ठीक वैसे ही जैसे मैने फोटो में देखी थी। मै रूआंसा सा हो गया। मुझे न जाने क्यों लगा कि मां अभी पुकारती है। उन्होंने सिर पर हाथ फेरा तो मैने अपने आपको सामान्य पाया।

आज परमहंस गुरूदेव डा. जितेंद्र चंद्र भारतीय की 102 वीं जयंती है। मां के दर्शन कराने वाले महान आत्मा तब मेरे लिए बड़े मौसा जी भर थे। अब उनके बारे में कहीं सुनता और समझता हूं तो खुशी होती है कि मुझे इतने बड़े गुरू के सानिध्य में रहने का मौका मिला।

भारतीय जी के जीवन और कार्यों पर कई विश्वविद्यालयों के छात्र शोध कर चुके हैं। तंत्र विद्या में भारतीय जी का देश ही नहीं विदेशों में भी बड़ा नाम था। उन्होंने विभिन्न भाषाओं और विषयों पर 30 से अधिक पुस्तकें लिखी। श्रीलंका में आप इंडियन स्वामी योगाचार्य भारतीय के नाम से प्रसिद्व हुए। ऐसी महान आत्मा का श्रृद्धांजलि।

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