गांधीवादी गणतंत्र पर हो फोकस

गांधीवादी गणतंत्र पर हो फोकस

- in देहरादून
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डा. अफरोज इकबाल।
महात्मा गांधी ने सबसे पहले राज्य की हिंसा का विरोध किया तथा उन्होंने विकेन्द्रित , ग्राम आधारित गणतंत्र की बात की। ’ गाँधी एक कमजोर राज्य एवं मजबूत ग्राम ’ चाहते थे। स्वराज को धरातल पर मजबूत देखना चाहते थे। इसमें गांव की मजबूती पर जोर था

गांधी शोषण मुक्त समाज के लिए सामाजिक न्याय को अनिवार्य मानते थे । सामाजिक न्याय प्रदान करने के मामले में जाति प्रथा , रूढ़िवादिता , साम्प्रदायिकता , अज्ञानता , अस्पृश्यता बाधक थे । गाँधी ने उक्क कुरीतियों के खात्मे के लिए अपने हिसाब से काम किया और काफी हद तक सफल भी रहे।

गाँधी का सर्वोदय के पक्षधर थे। उनका ये दर्शन समाज के हर वर्ग की खुशहाली व कल्याण की बात करता है। गाँधीवाद की नजर अमीर व गरीब दोनों पर है , गाँधीवाद अमीरों के नैतिक विकास और गरीबों के आर्थिक विकास में रुचि रखने वाला न्यायोचित विचारधारा है।

गाँधीवाद वर्ग – संघर्ष नहीं , वर्ग समन्वय की वकालत करने वाली मानवोचित विचारधारा है । ’ गाँधीवाद आज न केवल दो सिद्धान्तों के विकल्प के रूप में हैं बल्कि यह मानव के विकास का वैकल्पिक सिद्धान्त बन चुका है ।

आज हम ’ हिन्द स्वराज ’ या गाँधीगिरी का नारा पूरे विश्व में सुन रहे हैं । हिन्द स्वराज ’ पुस्तक 1909 में प्रकाशित हुई । यह पुस्तक कभी अंग्रेजों के लिए क्रांति की बम थी। आज ये पुस्तक समाज में न्यायोचित व्यवस्था का बड़ा दस्तावेज की तरह है।

बापू पंचायती राज को सत्ता के विकेन्द्रीकरण और व्यापक राजनीतिक भागीदारी पर जोर देते हैं। पंचायती राज व्यवस्था को गाँधी द्वारा ’ धरातलीय प्रजातंत्र ’ कहा जाता था। बापू का मानना था कि पंचायती व्यवस्था से ग्रामीण स्तर का व्यापक विकास किया जा सकता है गरीब से गरीब लोगों को राजनीतिक स्वतंत्रता का अहसास कराया जा सकता है । पंचायती – व्यवस्था से सत्ता एवं शक्ति एक हाथ में केन्द्रित न होकर अनेक हाथों में विभाजित हो जाएगी ।

गाँधी समाजिक जीवन में नशाखोरी की बढ़त प्रवृति को देखकर काफी दुःखी है । उनका मानना है कि इस प्रवृति से व्यकि के व्यक्तित्व के साथ – साथ अर्थ , प्रतिष्ठा को तो हानि होती ही है , पूरा सामाजिक व्यवस्था दूषित व विकृत होने लगती है ।

आजादी के 74 वर्षों के बाद भी ऐसा सम्भव इसलिए नहीं हुआ क्योंकि गाँधीवादी रास्ते पर चलकर समस्या के निराकरण के लिए जमीनी कार्य नहीं हुए । आजादी के बाद सरकारी तंत्र में काफी चूक हुई हैं। इसलिए तमाम सामाजिक व्याधियां सामने आई। अहिंसा के रास्ते का त्याग कर हिंसा को इन्होंने अपना विकल्प बना लिया है । इनके बीच दूसरी गाँधीवादी क्रांति की आवश्यकता है ।

कांटोवस्की अपनी पुस्तक ’ सर्वोदय ’ में लिखते हैं – ’ अतः रचनात्मक कार्यक्रम गाँधी जी की स्वराज्य की संकल्पना को समझने के लिए केन्द्रीय बिन्दु है । गाँधी जी के लिए स्वराज्य , राम राज्य या ईश्वर के राज्य के लक्ष्य की ओर सोपान के रूप में था जिसमें अन्तिम व्यक्ति समान रूप से भागीदार था।

स्वराज्य की संकल्पना आत्मनिर्भरता पर आधारित थी । जो अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है , वह स्वतत्र नहीं हो सकता । जब गाँधी जी खादी पर बल देते थे तो इसका अर्थ केवल यह नहीं था कि वे वस्त्र आत्मनिर्भरता पर बल देते थे प्रत्युत वे सम्पूर्ण देश को स्वदेशी मनोवृत्ति से सम्पन्न करना चाहते थे ।

खादी का अर्थ है पूर्णरूपेण स्वदेशी भावना , एक ऐसी निश्चय जिससे भारत में जीवन की सभी आवश्यकताएं पूरी हो सकें और वह भी ग्रामीणों के श्रम और बुद्धि के द्वारा । इसका अर्थ है वर्तमान प्रक्रिया को पूर्ण रूप से बदलना । मनुष्य मात्र की सेवा ही गाँधी जी के लिए आत्मानुभूति और आत्मज्ञान तथा मोक्ष का साधन थी ।

महात्मा गाँधी ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस के संबंध में बताया कि राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है लेकिन उसे अब भी आर्थिक सामाजिक और नैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करनी है । इन स्वतंत्रता को प्राप्त करना राजनैतिक स्वतंत्रता से अधिक कठिन है क्योंकि वे रचनात्मक हैं और कम उद्देश्य वली और चमत्कारहीन है ।

21 वीं शताब्दी के परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार के टि पर स्वप्नदर्शी और प्रगति विरोधी प्रतीत होते हैं । परन्तु वास्तव में उनके विचार गरीब किसानों और कामगारों पर हो रहे बड़े आधुनिकीकरण के दुष्प्रभावों की व्याख्या करते थे । आगे चलकर गाँधीजी ने अपने सामाजिक और आ क विचारों को एक निश्चित दिशा देने का प्रयास किया।

गाँधी जी ने स्वराज्य का जो माडल प्रस्तुत किया वह विश्व के इतिहास में अद्वितीय है ।

लेखक गवर्नमेंट कॉलेज में प्राध्यापक हैं।

1 Comment

  1. Salute you 💯

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