विलुप्ति की कगार पर पहुंची घराट और इससे जुड़ी परंपराएं

विलुप्ति की कगार पर पहुंची घराट और इससे जुड़ी परंपराएं

- in चमोली
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विनोद सिंह ।
घराट (घट) और इससे जुड़ी परंपराएं अब विलुप्त होने की कगार पर हैं। कथित विकास ने पहले ग्रामीण क्षेत्रों की सहभागिता को लीला और अब आत्म निर्भरता के घराटों को चोट पहुंचाई। बहुत कम गांवों में घराट का उपयोग हो रहा है।

पिछली सदी के 1980-90 के दशक तक घराट ग्रामीण जीवन के अभिन्न अंग होते थे। उत्तराखण्ड के प्रत्येक गधेरे में समीपवर्ती गांवों के लोगों द्वारा अनाज पीसने हेतु घराटों का निर्माण किया जाता था। जिन्हें आपसी सहभागिता से निर्मित किया जाता था। घराट आय के प्रमुख साधन ही नहीं होते थे अपितु समाज सेवा हेतु निर्मित किये जाते थे।

घराट के पाट (पत्थर) जिसे पाथर कहा जाता था यह सेवा निशुल्क होती थी जिसे लाने व तरासने में सेवित गावों के 40 से 50 लोगों की मदद से खांनसे सागं जोतकर पहाड के कठिन रास्तों से घराट तक लाया जाता था। लोग इसे पुनीत कार्य मानते थे। घराट स्वामी के द्वारा इस कठिन कार्य को सम्पन्न कराने वाले सहयोगियों हेतु घी से निर्मित हलुवा खिलाया जाता था। जो कि सामाजिक सहभागिता का उदाहरण था।

चमोली जिले की पिंडर वैली की बात करें तो सन 90 के दशक में कडाकोट जिसका विस्तार कोट, भटियाणा, केदारकोट, कोथरा, कोठली, चिरखुन, सैंज, जाखपाटियू कफातीर, लोदला बेथरा, डडुवागाड, सोल्टा रेंस, चोपता भंगोटा, कुश, डुगरी, पैतोली से ईडा सडकोट तक था जिसमें लगभग 60 से 70 ग्राम आते है।

प्रत्येक दो गांवों के मध्य दो से चार घराट हुआ करते थे। 80 से 90 के दशक में जाख पाटियू के गडनी गधेरे में जाख निवासी व्यक्ति द्वारा लकडी के दूध के बर्तन (परिया परोठा का निर्माण बुरांस के पेड के तने से किया जाता था। आज यह परम्परागत कला विलुप्त हो चुकी है।

90 के दशक से पूर्व ग्रामीण लोग दिनभर अपने दैनिक कार्यों को निपटाकर तीन चार के समूह में रात के समय घराट जाया करते थे। घराट जाने हेतु चिंगरी का प्रयोग किया जाता था, जो रिंगाल से निर्मित होती थी। प्रत्येक चिंगरी में शुद्व मडवा का एक थैला दो रंगा (गेंहू तथा मंहुवा) एक थैला तथा मवेशियों हेतु पिण्डे का एक थैला अवश्य हुआ करता था।

रात के समय घराट जाने हेतु भीमल की लकडी तथा चीड के लकडी के छिल्लों का उपयोग मसाल के रूप में किया जाता था। नारायणबगड व थराली के बीच के ग्रामों में भी घराटों की संख्या बहुतायत थी। पिण्डर घाटी के गडनी गाड रेइ नामतोल, गैराबारम मल्तुरा केवर के गधेरों में घराटों के अब मात्र अवशेष ही शेष बचे है।

नीति नियंताओं के बेरूखी ने रही सही कसर पूरी करके रख दी। द्वारा समय पर इन परम्परागत घराटों सानों का संवर्धन किया जाता तो आज के युग में एक बेहतर आत्मनिर्भर जीवन जीने में ये बहुत मददगार होते तथा पहाड़ के पानी और जवानी का नवीन तकनीक द्वारा बेहतर उपयोग किया जाता था घराटों के बन्द होने के पीछे मुख्य कारण बरसात में घराटों का बार बार बह जाना या नष्ट हो जाना घराट स्वामी का बार बार इनका निर्माण करना संभव नही हो पाता था।

गधेरों में स्थानीय ठेकेदारों द्वारा किये जा रहे खनन तथा वर्तमान समय में ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाली सडकों के कारण भी कई क्षेत्रों के घराट नष्ट हो चुके हैं आज घराटों का स्थान गांव गांव में बिजली से चलने वाली चक्कियों ने ले लिया है जो समय की बचत तथा कम मेहनत का सरल संसाधन है।

यह समय की मांग है। जो भी उद्योग तकनीक व समय के साथ स्वयं को परिष्कृत नहीं कर पाता है उसे विलुप्त होना ही पडता है। वरना घराट के आटे के स्वाद और पौष्टिकता तथा लकडी के बर्तनों का भोजन के स्वाद का आज के आधुनिक पात्रों से कोई मेल नही काश कि हम ओर हमारी सरकारें समय पर ध्यान दे पाती तो हमारे घराटों और परम्परागत उद्योगों को आज अम्बेसडर कार की तरह विलुप्त नही होना पडता। जिसमें कोई खराबी नहीं थी सारी खुबियों के बावजूद स्वयं को आधुनिक रूप में परिष्कृत ना कर पाने के कारण आज बाजार से लुप्त हो चुकी है। यदि आज भी जन सहभागिता व सरकार के सहयोग से इस विषय पर कोई ठोस कार्य हो तो ग्रामीण क्षेत्र में विधुत उत्पादन, मत्स्य पालन तथा अनाज पिसाई हेतु एक उत्तम संसाधन फिर से पुर्नजीवित हो सकता है।
लेखक राजकीय इंटर कालेज में प्रवक्ता हैं।

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