विदेशों में भी बज रहा है हिन्दी का डंका

विदेशों में भी बज रहा है हिन्दी का डंका

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दार-ए-सलाम से डा. श्वेता भट्ट।

हिन्दी का कारवां अब काफी आगे बढ़ चुका है। कहा जा सकता है कि हिन्दी से बेचारगी का खोल हट चुका है। हिन्दी अपना डंका विदेशों में भी बजाने लगी है। विश्व के अधिकांश देशों में हिन्दी भाषा और साहित्य को लेकर रूचि बढ़ी है।

भारत में 14 सितंबर 1949 को हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में मान्यता दी थी। तब से इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिन्दी दिवस अब सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विश्व के तमाम उन देशों में भी मनाया जाता है जहां भारतीय समाज बसा हुआ है।

इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि विदेशों में बसे भारतीय समाज ने हिन्दी को विश्व फलक पर स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। विदेशी धरती में हिन्दी में वार्तालाप सुनने अब आश्चर्य की बात कतई नहीं है। मुझे दार-ए-सलाम (तंजानिया की पूर्व राजधानी) में रहते हुए इसका अनुभव हुआ। हिन्दी विषय का विद्यार्थी होने और विदेश में हिन्दी के बारे में अच्छा सुनना ने गर्व की अनुभूति कराई।

बहरहाल, विश्व के दो दर्जन से अधिक बड़े देशों के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा और साहित्य के विभाग हैं और हिन्दी का अध्ययन होता है। अच्छी बात ये है कि अब हिन्दी के साथ संस्कृत भी अपना स्थान बना रही है। लोग इसके बारे में जानना और समझना चाहते हैं। विदेशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी की प्रति लोगों में काफी रूचि है।

इसके पीछे भारतीय संस्कृति को जानने विदेशियों की लालसा भी है। इसके अलावा भारत की विशाल जनसंख्या और बड़े बाजार ने भी हिन्दी के लिए काफी संभावनाएं बढ़ाई हैं। बाजार के माध्यम से ये संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। हिन्दी के विकास के लिए ये अच्छा संकेत है।

विश्व की तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां के उत्पादों के प्रचार-प्रसार में हिन्दी को प्रमुख स्थान मिला है। ये क्रम लगातार बढ़ रहा है। कहा जा सकता है कि हिन्दी का कारवां अब काफी आगे बढ़ चुका है। इस कारवां को अब विभिन्न माध्यमों से गति भी मिलने लगी है। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी बेचारगी के खोल से बाहर निकल चुकी है।

ऐसे में जरूरी है कि हिन्दी को कमत्तर आंकने की देश में बनी मनस्थिति से बाहर निकला जाए। अंग्रेजी भाषा को लेकर समाज में बने खास भ्रम को तोड़ना होगा। ताकि हिन्दी की विशिष्टता का हर किसी को भान हो। नई पीढ़ी जान सकें कि हिन्दी में भी वो सब काम अंग्रेजी से बेहतर हो सकता है जिसके बारे में भ्रम बनाया गया है।

हिन्दी भाषा में ज्ञान-विज्ञान को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाने की क्षमताएं हैं। इसकी वर्णमाला के एक-एक शब्द में भावना, संभावना और शिष्टाचार का प्रतिनिधित्व है। हिन्दी बोलें, हिन्दी को कामकाज में अपनाएं।

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