कांस्य पदक के साथ भारतीय हॉकी का स्वर्ण युग लौटा

कांस्य पदक के साथ भारतीय हॉकी का स्वर्ण युग लौटा

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राजेश रावत।
करीब 41 साल बाद ओलंपिक खेलों में अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी में पदक हासिल करने वाली भारतीय हॉकी के स्वर्ण युग की वापसी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। देश में इसको लेकर देख रहा उत्साह और व्यवस्था के स्तर से मिल रहे रिस्पांस से तो कम से कम यही लग रहा है।

हॉकी में भारत का इतिहास खासा शानदार रहा है। लगातार कई ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पर भारत का एकाधिकार रहा। सुविधाओं के अभाव के बावजूद भारतीय हॉकी खिलाड़ी दुनिया में छाए रहे। भारत ने विश्व हॉकी को ध्यान चंद जैसे तमाम खिलाड़ी दिए।

बहरहाल, देश की आजादी की बाद 1948 में लंदन ओलंपिक से भारतीय हॉकी का डंका बनजे लगा था। 1948 से पहले हुए छह ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी खिलाड़ियों ने विश्व हॉकी पर अपनी छाप छोड़ी।

1948 के लंदन ओलंपि में स्वर्ण पदक से शुरू हुआ सिलसिला 1952, 1956 तक भारत ने इस खेल में स्वर्ण पद हासिल किए। 1960 के रोम ओलंपिक के फाइनल में भारत पाकिस्तान से एक गोल से हार गया। 1964 के टोक्यो ओलंपिक में भारत ने फाइनल में पाकिस्तान को हराकर हिसाब बराबर कर दिया।

1968 मैक्सिको ओलंपिक में भारत फाइनल तक नहीं पहुंच सका। 1972 में म्युनिक ओलंपिक में भी ऐसा ही हुआ भारत को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। 1976 के मांट्रियल ओलंपिक में पहली बार एस् ट्रो टर्फ का उपयोग शुरू हुआ। इस ओलंपिक में भारत पहले चार में भी स्थान नहीं बना सका।

1980 मॉस्को ओलंपिक में भारत ने स्वर्ण पदक हासिल किया। हालांकि इस स्पर्द्धा में विश्व की नौ टीम शामिल ही नहीं हुई। इसके बाद तो ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी की रंगत एक तरह से फीकी पड़ती रही। 1984 के लॉस एंजिसिल ओलंपिक, 1988 सियोल ओलंपिक, 1992 का बार्सिलोना ओलंपिक, 1996 का अटलांटा ओलंपिक, 2000 का सिडनी 2004 के एथेंस ओलंपिक के परिणाम भारतीय हॉकी की दुर्दशा की कहानी बयां करता है।

2008 के बीजिंग ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ओलंपिक के लिये क्वालीफाई नहीं सकी। तब लगा कि अब भारतीय हॉकी एक तरह से समाप्त हो चुकी है। 2012 के लंदन ओलंपिक में भारत एक भी मैच नहीं जीत सका। 2016 के रियो ओलंपिक टीम का प्रदर्शन सुधरा और टीम क्वार्टर फाइनल तक पहुंची।

चार-पांच सालों में भारतीय हॉकी में जबरदस्त सुधार हुआ है। 2021 टोक्यो ओलंपिक इस बात का प्रमाण है। भारत ने तीन बार की चैम्पियन जर्मनी को 5 -4 से हराकर भारत ने 41 साल बाद ओलंपिक में पदक जीता।

भले ही भारत ने कांस्य पदक जीता हो। मगर, ये किसी सोने से कम नहीं है। देश के खेल प्रेमियों से लेकर आम लोगों का तो ऐसा ही मानना है। दरअसल, इसे कांस्य पदके साथ भारतीय हॉकी के स्वर्ण युग में वापसी माना जा रहा है।

दरअसल, लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच चुकी भारतीय हॉकी के लिए ओलंपिक का पदक किसी संजीवनी से कम नहीं है। ये पदक देश में हॉकी को लेकर उत्साह जगाएगा। हॉकी को अच्छे स्पान्सर मिलेंगे। क्रिकेट की तरह हॉकी भी देश में लोकप्रिय खेल बनेगा। लोग नौनिहालों को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करेंगे। फिर से विश्व हॉकी में भारतीय हॉकी का डंका बजेगा।

हालांकि इसके लिए बेस स्तर पर काफी काम करने की जरूरत है। हर खेल की बेहतरी के लिए स्कूलों पर ध्यान देना होगा। ताकि देश में खेलों को लेकर माहौल बन सकें।
लेखक- खेल प्रशिक्षक हैं।

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