सरकार! मजदूर होना गुनाह क्यों हो गया

सरकार! मजदूर होना गुनाह क्यों हो गया

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सुदीप पंचभैया।
ऋषिकेश। क्या भारत में मजदूर होना गुनाह है ? जी हां, इन दिनों लग तो कुछ ऐसा ही रहा है। देश के विकास को आकार देने वाले दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।

भारत में गरीब, मजदूर और किसानों के नाम पर सत्ताएं सजती हैं। व्यवस्थाएं सबसे अधिक मालाएं इन्ही के नाम पर जपती हैं। कहा जाता है कि मजदूर ही देश के विकास को गति देते हैं। उनके बगैर देश की तरक्की आकार नहीं ले सकती। ये स्थापित सत्य भी है। मजदूर देश तरक्की की नींव का पत्थर होते हैं। बावजूद इसके उक्त वर्ग का बुरा हाल है।

देश में गरीबों और मजदूरों किस हाल में हैं ये इन दिनों सड़कों पर दिख रहा है। वो महानगरों से सैकड़ों किमी. की दूरी पैदल चलकर तमाम टोकाटाकी सहन की अपने घर पहुंच रहे हैं। दरअसल,वैश्विक महामारी कोविड-19 के लॉकडाउन समाप्त होने की संभावना न देख महानगरों में रह रहा मजदूर तबका घर जाने को व्याकुल हो गया।

इस व्याकुलता के पीछे कहीं न कहीं उनके रहने, खाने-पीने की जिम्मेदारी में दिखी अव्यवस्थाएं थी। काम पर भरोसा रखने वाले मजदूर याचक बनकर ज्यादा देर नहीं रह सकता। यही वजह है कि मजदूर इन अव्यवस्थाओं से निजात पाने के लिए पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़े। इसमें कुछ को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। मगर, मजदूरों का पैदल ही अपने घरों का निकलने का क्रम जारी रहा।

मजदूर अपने दुधमुंहे बच्चों को गोद में लेकर सड़कों पर निकले तो हो हल्ला मच गया। सियासत शुरू हो गई। केंद्र और राज्यों में कभी रेल तो कभी बसों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच व्यवस्था के दावों के पोल भी खुलने लगी। बावजूद इसके सियासत जारी है और जारी रहेगी।

लोग सड़कों पर घर जाने के लिए पग भर रहे हैं और व्यवस्था आकाशीय चैनलों में राहतों का अर्थशास्त्र समझा रही हैं। इस खेल में हर कोई व्यवस्था शामिल है। दावा हो रहा है कि संकट की इस घड़ी में व्यवस्था गरीब और मजदूरों के साथ खड़ी है। व्यवस्था जरूर खड़ी होगी। मगर, मजदूर तो तपती धूप में पैदल चल रहा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश में मजदूर होना गुनाह है। देश को सजाने-संवारने और तरक्की की राह पर आगे बढ़ाने में नींव का पत्थर बनना क्या गुनाह है। यदि गुनाह नहीं है तो इन दिनों मजदूरों की सड़कों पर फजीहत होती क्यों दिख रही है।

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