कोरोना की मार और नैतिकता का संकट

कोरोना की मार और नैतिकता का संकट

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सुदीप पंचभैया।
वैश्विक महामारी कोरोना ने समाज की नैतिकता की पोल खोलकर रख दी। भारत में प्रचलित विश्व गुरू जैसे शब्द मुंह चिढ़ाने लगे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या हम अन्य संस्कृतियों से हटकर ऐसे हैं जहां दूसरों की मजबूरी और अलाचारी का लाभ उठाने वाले घात लगाकर बैठे हैं।

भारत में कोरोना महामारी इन दिनों चरम पर है। लोग दहशत में हैं। सिस्टम हर स्तर पर असफल साबित हो रहा है। मारे कोरोना के पीड़ितों की सांस थम रही हैं और देखभाल करने वाले परिजन असहाय बनकर रह गए हैं। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा है। जिन हालातों से लोग गुजर रहे हैं उसके परिणाम बाद में देखने को मिलेंगे।

बहरहाल, ऐसे समय में देश और समाज को नैतिकता जिंदा रख सकती है। मगर, समाज में ऐसा नहीं दिख रहा है। देश में हर स्तर पर नैतिकता का संकट गहरा गया है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। मगर, नैतिकता का हास इस कदर हो चुका है ऐसा पहली बार लोग महसूस कर रहे हैं।

दरअसल, मुनाफाखोरों ने कोरोना संक्रमण को भी कमाई का जरिया बना दिया है। दवाइयों की कालाबाजारी से लेकर हॉस्पिटलों में पैंसों के खेल से हर कोई हतप्रभ है। प्राण वायु ऑक्सीजन की जमाखोरी हर किसी को सोचने को मजबूर करती है।

हालात ये हो गए है कि जिसे जहां मौका मिल रहा है वो मजबूर और लाचार लोगों का आर्थिक शोषण कर रहा है। छोटी-बड़ी, कम ताकत-अधिक ताकत वाली व्यवस्था नाम की चिड़िया इन सब बातों पर आंखें बंद किए हैं। यही नहीं कई मामलों में तो बड़े-बड़े सफेदपोशों पर भी आरोप लग रहे हैं। ये बात भी सच है कि ऐसे लोगों को सिस्टम से कहीं न कहीं प्रश्रय भी मिलता है।

दरअसल, ये सब बातें सरकारों से अधिक समाज पर भी निर्भर हैं। समाज में अब नैतिकता बस शब्द भर रह गया है। ये शब्द नसीहत के रूप में अधिक उपयोग हो रहा है। ये हमारे एजुकेशन सिस्टम पर भी सवाल खड़े करता है। एजुकेशन सिस्टम में नैतिकता से अधिक नंबर को महत्व दिया जा रहा है।

यही नहीं एजुकेशन सिस्टम में अब नैतिकता का मूल्यांकन ही नहीं होता। ऐसा स्कूलों में देखा जा सकता है। नैतिकता की ऐसी उपेक्षा के पीछे पॉलिटिकल सिस्टम का बड़ा हाथ है। ये अब सिस्टम का हिस्सा भी बन चुका है। फिर बाजारी शिक्षा से अब नैतिकता की उम्मीद करना ठीक नहीं है। यहां शिक्षा माल औ छात्र उपभोक्ता बनकर रह गया है। यहां सिर्फ और सिर्फ लाभ की कामना होती है।

पहली पाठशाला यानि घर में भी नैतिकता को बहुत ज्यादा तवज्जो अब नहीं मिल रही है। जब नैतिकता नहीं है तो समाज में नैतिक बल भी देखने को नहीं मिल रहा है। नैतिक बल यानि जो समाज में अनैतिक कार्यों का विरोध कर सकने वाली ताकत। इसका स्थान अपना काम बनता तो… ने ले लिया है।

नैतिकता आगे बढ़कर राष्ट्रीयता की ओर जाती है। यदि समाज में नैतिकता ऐसा हास हो रहा है तो राष्ट्र वाद को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं।

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