..और मदर्स डे पर मां से मिलने चला गया कलुवा

..और मदर्स डे पर मां से मिलने चला गया कलुवा

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अविकल थपलियाल।
बीते दिसंबर 2019 की कोई एक सर्द सुबह। सामने बिजली घर के डिपो के गेट की सींखचों पास आये तीन पिल्ले। तीनों का रंग एकदम काला। मैं बुदबुदाया पिछले साल ही तो यह लावारिस लँगड़ी तीन काले-भूरे बच्चों की मां बनी थी। जो अब ठीक ठाक शंड मुश्टण्ड भी हो गए थे। अब फिर पैदा कर दिए तीन और। काले रंग के आधा दर्जन बच्चों की मां। लंगड़ी खुद क्रीम कलर की थी। लेकिन लंगड़ी के छह काले बच्चे गवाह थे कि उन सभी का बाप एक ही है। अक्सर खास मौकों पर वो काला बाप बिजली डिपो घर में रखे ट्रांसफार्मर के बीच झांकता हुआ दिख जाता था।

जब -जब इस  अनकहे रिश्ते से जुड़े इस बिजली गैंग को खाना दिया जाता तो वो बाप कभी भी उस खाने में मुंह नही मारता था। (चूंकि ये श्वान परिवार बिजली घर के डिपो में रहता था लिहाजा मैं उन्हें बिजली गैंग कहने लगा। )साफ था कि बाप के खाने पीने का इंतजाम कहीं और हो रहा था।

मां कैसी होती है ये लंगड़ी को देख पूरा अहसास हो जाता था। पिल्लों के खाने के बाद ही लंगड़ी बचे खुचे को उदरस्थ करती। बिजली घर के सींखचों के लगभग 8×7 इंच के चौकोर आकार से सड़क पर निकलने का हुनर भी कम नही था। अपने शरीर को एक विशेष एंगल पर मोड़ना और फिर उस एकमात्र खुले हिस्से में सिर डालकर भारी शरीर को विशेष एंगल में मोड़ते हुए बाहर निकलना। और फिर अंदर जाना, ये सब बिजली गैंग के बाएं हाथ का खेल हो गया था।

दूसरे गैंग के कुत्तों का खतरा देख सड़क पर टहल रहे पिल्लों को एकदम से उस खुले छोटे स्पेस से अंदर करना। अंत में खुद सुरक्षित होना। फिर सभी का एकसाथ निरन्तर भौंकना बड़े से बड़े गैंग के छक्के छुड़ा देता था। बहुत निडर मां थी बिजली। बिजली भांप लेती थी कि अक्सर देर रात घर आने वाला ये शख्स कुछ खास लाएगा।

इस इंतजार में पूरा गैंग सड़क पर पसरा रहता था। पार्टी से बची खुची हड्डियां देख उनकी अर्द्धरात्रि गुलजार हो जाती। घर में नान वेज बनता उस पर तो बिजली परिवार का ही हक था। लंगड़ी अपने पिल्लों को कड़े अनुशासन में नियंत्रित रखती थी। पड़ोस की आशा व उसकी पुत्र-पुत्री नियमित तौर पर बिजली गैंग को भोजन-पानी दे रहे थे।

ट्रांसफार्मर व अन्य मशीनों से घिरे डिपो के काफी बड़े परिसर में यह परिवार काफी खुश व मस्त था। जाड़ों की धूप में पसरे रहना। मां के ऊपर लोट लगाना और फिर पिल्लों व शंड मुश्टण्ड हो चुके बड़े भाई बहनों का एक दूसरे से चुहलबाजी कर लोट लगाना। यह खुशनुमा दृश्य लगभग दो- ढाई साल से देख रहा था। चूंकि, बिजली घर के गेट पर ताला लटका रहता लिहाजा हम लोग सींखचों से ही खाना सरकाते।

एक पैर से निडर लंगड़ी मां बेहद संजीदगी से अपने परिवार को बेहतर भविष्य की ओर ले जा रही थी। जहां भोजन था और आवारा होने के बावजूद डिपो की सुरक्षित छत थी। जहां कोई दूसरा लँगड़ी के बच्चों को छू भी नहीं सकता था। लेकिन मोम की तरह अपने बच्चों के लिए पिघल रही लंगड़ी नए साल 2020 की शुरुआत में किसी तेज रफ्तार वाहन के नीचे आ गयी।

ये दुर्घटना 3-4 जनवरी की मध्य रात्रि किसी समय हुई। हमने सुबह ही उसका रक्तरंजित शरीर देखा।पता नही लग पाया कि हत्यारा कौन था। हम सभी लंगड़ी की चपलता के कायल थे। मॉडल कालोनी से गुजर रहे वाहनों की चपेट में आने से ऐन मौके पर कैसे बचना है, ये हुनर लंगड़ी को बखूबी आता था। बच्चों को भी तेज रफ्तार वाहनों से बचने की तरकीब सिखा चुकी थी। फिर भी वो वाहन के नीचे आ गयी।

लंगड़ी हमारी न तो रिश्तेदार थी और न ही पालतू। लेकिन उसकी मौत बहुत भावुक कर गयी। अक्सर ये बेजुबान कथित-तथाकथित अपनों से करीब हो जाते हैं।  अब देहरादून की ठंड में लंगड़ी के नवजात तीन पिल्लों को बचाना पहला कर्तव्य बन गया। मां की आड़ क्या होती है ये उसके पहले वाले बड़े हो चुके तीनों बच्चों के अंदर समा चुकी दहशत को देख लगा।

लंगड़ी मां की मौत के बाद बच्चे सड़क पर आने की हिम्मत नही जुटा पाए। ग्रिल के अंदर से ही उस सड़क को देखते रहते जो उनकी मां के खून से रंग चुकी थी। उधर, बाकी तीन छोटे पिल्लों को माँ का दूध नसीब नही हो रहा। अलबत्ता हम कुछ लोग उनको पर्याप्त भोजन पानी दे रहे थे। समय के साथ साथ पिल्ले भी पलते गए और उनके बड़े भाई बहन भी अपने सुरक्षित अहाते से निकल कभी-कभी सड़क पर आने लगे। सभी छह भाई बहन एक दूसरे में रमने लगे।

हालांकि, लंगड़ी की मौत के बाद इनमें से कोई सर्वमान्य अभिभावक की भूमिका में नही आ पाया। फिर भी जिंदगी चल रही थी। लेकिन तीनों पिल्लों की परवरिश में मां की गैरहाजिरी का कुप्रभाव भी साफ दिखने लगा। बड़ों की छोटों पर अक्सर आक्रमकता की गूंज घर तक सुनाई देने लगी। एक पिल्ला थोड़ा अलग-थलग भी देखा गया।

कोरोना बन्दी के दिनों में लगभग 5 महीने के हो चुके दूसरी पीढ़ी के तीन बच्चों में एक कलुआ सुस्त नजर आया। गेट के सींखचों के अंदर सरकाए जाने वाले खाने पर भी बेमन से आता। पड़ोसी आशा के पुत्र के जरिये कलुवे को डिब्बे में डाल अजबपुर कलां के पशु चिकित्सालय ले गए। तारीख थी 14 अप्रैल।

ड्रिप चढ़नी शुरू हुई। डॉक्टर उनियाल, डॉ रजनीश, डॉ शांति व नर्सिंग स्टाफ लावारिस कलुवे को बचाने में जुट गए। कलुवे को पीलिया के साथ हेपेटाइटिस की शिकायत थी। शरीर पर घाव भी था। एक दिन बड़े भाइयों ने कलुवे पर दादागिरी भी दिखाई थी। ये घाव उसी बदमाशी का नतीजा था। मेरे साथ आशा का परिवार कलुवे की हरसंभव मदद में उतर आया।

इस बीच कलुवे को उसके परिवार से निकाल आशा के घर शिफ्ट करना पड़ा। कई दिन ड्रिप व इंजेक्शन समेत अन्य दवाएं चली। चिकित्सकों ने इशारा कर दिया था कि कलुवा ज्यादा नही टिकेगा। फिर भी हमें उम्मीद थी। मवालियों की तरह सड़क पर खुल्ला टहल रहे दर्जनों आवारा कुत्ते मेरी पाजिटिविटी का मुख्य आधार बन रहा था। कलुआ कभी ठीक होने के संकेत भी देता।

थोड़ा-थोड़ा चिकन सूप दिया जाने लगा। थोड़ा चलने भी लगा। मां आशा और बेटी के दांत भी गड़ाए। दोनो इंजेक्शन लगवा रही है। इधर, कई दिन तक अस्पताल में दवा दारू भी चलती रही। इधर, 7-8 मई से कलुवा बुखार में तपा। लेकिन अपनी जंग पूरी शिद्दत के साथ लड़ रहा था। हम सभी की आंखे नम थी। आशा का परिवार तीन रात कलुवे के आस-पास ही डटा रहा। लेकिन कलुवा तो शायद अपनी मौत का दिन मुकर्रर कर चुका था।

लगभग 25 दिन मौत से लड़ रहा कलुवा 9 व 10 की मध्य रात्रि हम लोगों व अपने भाई बहनों को छोड़ मां के पास चला गया। 10 मई की सुबह मोबाइल खोलते ही पता चला कि आज तो मदर्स डे है। अबे अबोध कलुवे तूने कूच करने का दिन भी क्या चुना। मदर्स डे। अपनी मां लँगड़ी के पास चला गया। मां के पास पहुंच अब तेरी आत्मा को शांति मिल गयी होगी अभागे…तू सड़किये कलुवे कुछ भी तो नही था हमारा..पर कितना कुछ हो गया था …मलाल तो रहेगा तेरी जिंदगी बचा नही पाने का… भावभीनी श्रद्धांजलि रे कलुवे…..

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