देवभूमि में भाजपा के देवस्थानम विधेयक का सच

देवभूमि में भाजपा के देवस्थानम विधेयक का सच

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सुदीप पंचभैया। 

उत्तराखंड के चारधाम समेत 51 मंदिरों पर लागू होने जा रहे देवस्थानम विधेयक का सच क्या है। क्या वास्तव में इसके पीछे भाजपा की मंशा तीर्थों की व्यवस्था सुधारना है या फिर उत्तराखंड की शांत वादियांं में स्थित मठ मंदिरों को प्रयोगशाला बनाने की तैयारी है।

भाजपा राम-राम का जप और धर्म का हो हल्ला करते हुए केंद्र और राज्यों की सत्ता में आई। उत्तर प्रदेश का पर्वतीय क्षेत्र और अब उत्तराखंड राज्य की राजनीति में भी भाजपा की इंट्री इसी प्रकार से हुई। संघ का इसमें बड़ा रोल रहा। संघ ने धर्म-कर्म से जुड़े लोगों को कई तरह से भाजपा की ओर मोड़ा। इसमें चारधामों के तीर्थ पुरोहित हक हकूकधारी सबसे आगे रहे।

तीर्थ पुरोहित हक हकूकधारियों ने भाजपा और संघ का गुणगान देश भर में किया। हालांकि अब भाजपा इसे भूल गई है। उत्तराखंड के कई क्षेत्रों की राजनीतिक तासीर बदलने का काम भी तीर्थ पुरोहितों ने भाजपा के लिए किया। इससे भाजपा खूब फली फूली। अब भाजपा इतनी फल फूल गई कि वो संघर्ष के दिनों को भूलने लगी है। जिन मंदिरों के बूते भाजपा सत्ता तक पहुंची उन्हें अब सरकारी बनाना चाहती है।

तीर्थ पुरोहित हक हकूकधारी भाजपा और संघ के इस बदले रूप से हतप्रभ हैं। उत्तराखंड में देवस्थानम विधेयक इस बात का प्रमाण है। भाजपा सरकार भले ही दावा कर रही है कि इसके माध्यम से धामों/ मंदिरों की व्यवस्थाओं को चाक चौबंद करना चाहती है। मगर, सच ये नहीं है। राज्य गठन के 20 सालों में 10 साल उत्तराखंड में राज कर चुकी भाजपा ने कभी ऐसी झलक नहीं दिखाई।

बहरहाल, धामों की व्यवस्था सुधारने के लिए देवभूमि उत्तराखंड में देवस्थानम विधेयक की दूर-दूर तक जरूरत नहीं है। सरकार की ऐसी मंशा लगती भी नहीं है। सरकार चार धाम समेत उत्तराखंड के सभी मंदिरों को चाक चौबंद करे इस पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। इसके लिए एक्ट की क्या जरूरत है।

बदरी-केदार के मंदिर तो सीधे सरकार के नियंत्रण में हैं। यदि यहां कुछ कमी दिख रही है तो जाहिर है सरकार फेल हुई। ऐसे में देवस्थानम विधेयक से सरकार कैसे सफल होगी ये सोचने वाली बात है। यही बात भाजपा की मंशा पर सवाल खडे़ करती है।

दरअसल, देवस्थानम विधेयक धामों और मंदिरों की स्थापित और सनातनी परंपराओं में दखल की मंशा है। ये आरोप लग रहे हैं कि भाजपा इसके माध्यम से अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहती है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत समेत भाजपा नेताओं का रूख से काफी कुछ स्पष्ट भी हो जाता है।

धर्म के नाम पर अक्सर हो हल्ला और स्वयं को चिंतित दिखाने वाले संघ की चुप्पी भी बहुत कुछ बयां कर देती है। संघ के बड़े पदाधिकारी इस पर मुंह खोलने को तैयार नहीं है। भाजपाई सरकारी संरक्षण में तीर्थ पुरोहितों के गांधीवादी आंदोलन की खिल्ली उड़ा रहे हैं।

आंदोलन को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। ये सब भाजपा को कठघरे में खड़ा करता है। इससे भाजपा की हिंदुत्वादी छवि की भी पोल खुलने लगी है। देवभूमि के इतिहास- भूगोल की थोड़ी जानकारी भी रखने वाला बता देगा कि भाजपा चारधाम के विकास के पीछे के संघर्ष की अनदेखी कर रही है।

तीर्थ पुरोहितों के योगदान को भुलाने या उस पर अपना लेबल लगाना चाहती है। बहुमत के डंडे से उन्हें मंदिरों की व्यवस्था से खदेड़ने के प्रयास हो रहे हैं। ताकि स्वयं को मठ मंदिरों का चैंपियन घोषित कर सकें। ऐसा कर भाजपा बड़ी चूक करने जा रही है।

देश की धर्मावलंबी जनता जानती है कि उत्तराखंड के चारधामों का इतिहास सैकड़ों-सैकड़ों सालों का है। तीर्थ पुरोहित इसकी व्यवस्थाओं से पहले दिन से जुड़े हुए हैं। जबकि सरकार की धामों में मौजूदगी अभी सौ साल की भी नहीं हुई।

देवस्थानम विधेयक पर शक इसलिए भी हो रहा है कि देश भर में भाजपा की केंद्र और राज्य की सरकारें प्राइवेटाइजेशन की पैरवी कर रही हैं। तमाम सरकारी इंटरप्राइजेज प्राइवेट हाथों को सौंपे जा रहे हैं। उत्तराखंड सरकार का भी यही हाल है। ऐसे में मंदिरों को सरकारी जामा पहनाना समझा जा सकता है।

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