उत्तराखंड के 20 सालः क्या खोया और क्या पाया

उत्तराखंड के 20 सालः क्या खोया और क्या पाया

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सुदीप पंचभैया। 
उत्तराखंड राज्य 21 वें साल में प्रवेश कर कर गया। 20 सालों में राज्य निर्माण के उददेश्यों के सापेक्ष पहाड़ ने क्या खोया और क्या पाया, इस पर खूब चर्चा हो रही है। एक वर्ग उत्साह दिखा रहा है तो अधिसंख्य लोगों में हताशा और निराशा का माहौल है।

हर्षोल्लास की तिथि नौ नवंबर 2000 के बाद की छोटी-बड़ी बातों पर गौर किया जा तो ये बात उभरकर सामने आती है कि उत्तराखंड निजी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बन गया है। साफ लगेगा कि कौन क्या से क्या हो गए और कहां से कहां पहुंच गए।

राज्य आंदोलन के दौरान आम जन में जो जज्बा दिखा था, वैसा जज्बा 20 सालों में राज्य की बेहतरी के लिए नहीं दिखा। इसकी वजह व्यवस्था में आया स्वार्थ, भाई-भीतजावाद रही। इसका खामियाजा उत्तराखंड राज्य कई तरह से भुगत रहा है। राज्य का सामाजिक रंग-ढंग पूरी तरह से बदल गया है। मूल निवासी स्थायी निवासी कहलाए जाने लगे हैं

इससे राज्य एक तरह से खाला का घर बन गया है। बड़े मन और इसके माध्यम से यूपी और आस-पास के राज्यों को साधने की राजनीतिक दलों की हसरत ने मूल निवासियों को बेगाना बना दिया है। वो स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

इसका कारण जनता का सीधा और सच्चा होना भी है। लोगों ने लाठी-गोली खाकर राज्य लिया और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सौंप दिया। सौंपते वक्त नियंत्रणात्मक व्यवस्था बनाना लोग भूल गए। संभवतः उन्हें इस बात का भान था कि अपने बीच के नेता इस राज्य को संवारने का काम करेंगे। संभवत ये सबसे बड़ी चूक थी। लोगों ने क्षेत्रीयता को विकसित नहीं किया। ये बड़ी चूक साबित हो रही है।

राज्य के लिए सड़कों पर संघर्ष करने वाले लोग राज्य में दबाव समूह तक नहीं बन सकें। उत्तराखंड देश का अकेला राज्य है जहां मूल निवासियों का कोई दबाव समूह नहीं हैं। परिणाम दिल्ली से नियंत्रित राजनीति ने धीरे-धीरे असर दिखाना शुरू कर दिया। राज्य के वास्तवित सवाल हाशिए पर चले गए।

आज दून में इन पर आवाज उठाने वाले बहुत कम हैं। जो हैं उन्हें लोगों ने कभी विधानसभा नहीं पहुंचाया। सड़कों पर हुंकार भरने वालों को व्यवस्था ने सुविधाओं और राहतों का मोहताज बना दिया। सरकारों ने राज्य आंदोलनकारी चिह्नकरण की ऐसी अजीब शुरूआत की जिसने स्वतःस्फूर्त आंदोलन को ही कठघरे में खड़ा कर दिया।

उत्तराखंड का दर्द समझने वाली सरकारें होती तो उन लोगों का चिह्नकरण करती जो आंदोलन में दूर-दूर तक नहीं थे। बहरहाल, सड़कों पर राज्य के लिए हुंकार भरने वाले दफ्तरों की लाइन में लगे तो नेता स्वहित के लिए सामान जुटाने लगे।

यह क्रम आगे बढ़ा तो राज्य निजी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति की प्रयोगशाला बनकर रह गया। पूरी तरह से ऑटो मोड की इस प्रयोगशाला का कमाल देखिए कि 20 सालों में नौ मुख्यमंत्री तैयार कर दिए। मुख्यमंत्री नहीं इस प्रयोगशाला ने नेताओं को भी क्या से क्या बना दिया और कहां से कहां पहुंचा दिया। कुछ चंट चालाक लोग अत्यधिक संपन्न हो गए। ये संपन्नता कैसे आई बताने की जरूरत नहीं है। समय-समय पर तमाम आरोप भी लगते रहे हैं।

नौ नवंबर 2000 से पहले की स्थिति पर कैमरा घुमाया जाए तो काफी कुछ स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य कैसे निजी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बनकर रह गया है। इस प्रयोगशाला में अड़ोसी-पड़ोसियों के हित भी खूब रवां हुए। नेताओं ने राज्य को खाला का घर बना दिया। राज्य आंदोलन के दौरान जो आंदोलनकारियों का मखौल उड़ाते थे वो भी यहां खूब तर रहे हैं।

ये कहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है कि इससे भला तो उत्तर प्रदेश में था। वहां की सरकारों का पर्वतीय क्षेत्रों के प्रति जो भी रवैया रहता रहा हो। मगर, सरकारी मशीनरी उत्तराखंड जैसे निष्ठुर कतई नहीं थी। देहरादून स्थित सचिवालय में अधिकारियों में न तो सुदूर क्षेत्रों का दर्द दिखता है और न ही राज्य की पीड़ा ही झलकती है।

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