राज्य के मुददों पर सांसदों की चुप्पी

राज्य के मुददों पर सांसदों की चुप्पी

देहरादून। उत्तराखंड के पांचों लोक सभा सांसद राज्य के मुददों पर चुप्पी साधे हुए हैं। परिणाम दिल्ली में राज्य की विभिन्न मामलों में मजबूत पैरवी नहीं हो पा रही है।

राज्य गठन के बाद दिल्ली में राज्य के सांसदों का परफारमेंस किसी से छिपा नहीं है। ऐसे बहुत कम मौके देखने को मिले जब राज्य की बेहतरी के लिए सभी सांसद दिल्ली में एकजुट हुए हैं। 2009 में राज्य की जनता ने पांचों सीट कांग्रेस को सौंपी।

हरिद्वार के सांसद हरीश रावत केंद्र में मंत्री बनें। मगर, उनका दिल और दिमाग उत्तराखंड में लगा रहा। वो मुख्यमंत्री बनने के बाद ही माने। इसी प्रकार 2014 में जनता ने पांचों सीट भाजपा को सौंपी। तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को सांसद बनाकर दिल्ली भेजा।

उम्मीद थी की तीनों अनुभवी नेताओं का राज्य को लाभ मिलेगी। मगर, ऐसा दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है। केंद्र में राज्य मंत्री अल्मोड़ा के सांसद अजय टम्टा भी खास असर छोड़ने में नाकाम दिख रहे हैं। पार्टी के पांचों सांसद राज्य के तमाम मुददों पर चुप्पी साधे हुए हैं।

चुप्पी ही नहीं राज्य में उनकी सक्रियता ना के बराबर रह गई। सांसदों के राज्य के प्रति इस रवैए से दिल्ली में कई मामलों में उत्तराखंड की मजबूत पैरवी नहीं हो पा रही है। ताजा मामला बीएड प्रशिक्षित 13 हजार से अधिक प्राथमिक शिक्षकों का है। राज्य के सांसदों ने इसके निराकरण में अभी तक रूचि नहीं दिखाई।

ऋषिकेश एम्स का मामला भी ऐसे ही है। बात ये भी सामने आती रही है कि प्रदेश सरकार राज्य के सांसदों के बीच सामंजस्य का अभाव है। सरकार सांसदों की सक्रियता मात्र से ही विचलित दिखती है। इसका खामियाजा राज्य को भुगतना पड़ रहा है।

 

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