उत्तराखंड में विनाश की पटकथा लिखता विकास

उत्तराखंड में विनाश की पटकथा लिखता विकास

- in शिक्षा
0

डॉ. दलीप सिंह बिष्ट। 
जी हां, पर्वतीय राज्य में ऐसा ही कुछ दिख रहा है। यहां विकास के नाम पर प्रकृति के साथ हो रही अवैज्ञानिक छेड़छाड़ विनाश की पटकथा लिखना साबित हो रहा है।

उत्तराखण्ड में विभिन्न निर्माण कार्य जैसे सड़क, बांध परियोजना, रेलवे लाइन के लिए भूवैज्ञानिक फॉल्ट लाइन, वनों की कटाई, विस्फोटक के इस्तेमाल, भूस्खलन के जोखिम को नजरअंदाज किया जा रहा है। सैकड़ों पनबिजली परियोजनायें यहां निर्माणाधीन है और कुछ प्र्रस्तावित है, जिनके निर्माण ने पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव के साथ-ंसाथ यहां आपदाओं को में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

अब ऑलवेदर रोड में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है। लगातार हादसे हो रहे हैं। इसने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी हैं। वर्षा का होना प्राकृतिक प्रक्रिया है, किन्तु नदियों के मुहानों पर अनियमित, असुरक्षित और अनियोजित विकास तो मानवजनित है जिसने इन आपदाओं को त्रासदी बनाने का काम किया है।

देश में नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जाता रहा है। जिसमें उत्तराखण्ड भी पीछे नही है। यही कारण है कि आपदाओं से जो क्षति होती है उससे स्पष्ट पता चलता है कि प्रकृति प्रलोभन को कभी भी स्वीकार नही करती। उत्तराखंड में विगत कई सालों से भूस्खलन, भूक्षरण, हिमस्खलन, नदियों में गाद की मात्रा में निरंतर वृद्धि एक गम्भीर चुनौती बन गई है, जिसका मानव जीवन पर व्यापक प्रभाव देखने को मिल रहा है।

यह स्थिति न केवल उत्तराखंड हिमालय के पर्यावरण के प्रदूषण चपेट में आने का संकेत है, वरन् यह भी स्पष्ट करता है कि इन विसंगतियों का संबंध मानव द्वारा प्रकृति के साथ किया जा रहा निर्मम व्यवहार है, जिसमें? वनों का अनियमित व अनियंत्रित दोहन भी -रु39यामिल है।

उत्तराखंड जो कि पूरे देश में अच्छी वन सम्पदा वाले क्षेत्रों में गिना जाता है, अनियंत्रित वन कटान, सड़कों तथा बॉध निर्माण में किये जा रहे भारी विस्फोटों के कारण इस हलचल से अछूता नहीं रहा है। परिणामस्वरूप यह क्षेत्र कई बार भूस्खलन, भू-ंक्षरण व बादल फटने की घटनाओं का शिकार हो गया है तथा हो रहा है।

भूस्खलन की समस्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। बरसात का मौसम शुरू होते ही पहाड़ों का दरकना शुरू हो जाता है जिससे सड़कों का बन्द होना तो आम बात है परन्तु कई बड़ी-ंबड़ी दुर्घटनायें देखने सुनने को रोज मिलती है। जान माल का नुकसान हो रहा है। ऑल वैदर रोड़ निर्माण ने इस समस्या को वर्तमान समय में और भी अधिक विकट बना दिया है जिसके कारण कभी पत्थरों के गिरने से किसी की जान चली जाती है तो कभी गाडियां पहाड के नीचे दबने के समाचार सुनने को मिलते है।

पहाड़ों का मलवा नदियों में प्रभावित करने से यह समस्या और भी तीब्र हो जाती है जिसके कारण मैदानों में बा-सजय़ का प्रकोप बढ़ जाता है और इससे जनधन को भारी नुकसान पहुंचता है। हर वर्ष दावे तो किये जाते है पर आज तक समाधान कही से भी नजर नही आता है।

बदरीनाथ हाइवे पर सिरोबगढ़ की समस्या हम पिछले 25-30 सालों से ज्यों की त्यों है। तो बांसबाडा इसका नया केन्द्र बनता जा रहा है। आज पहाडों पर सफर करना जोखिम भरा होता जा रहा है जिसको हमारी योजनायें और भी दुखद बनाती जा रही है।

यह भी पढ़ेः अब देवप्रयाग में ही बनेगी एनसीसी एकेडमी

यह भी पढ़ेः कोरोनाः उत्तराखंड में डरावने हालात, आज 298 पॉजिटिव

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

मुख्यमंत्री के ओएसडी का निधन

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के ओएसडी गोपाल