गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज पोखरी में साहित्यानुवाद पर राष्ट्रीय वेबीनार

गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज पोखरी में साहित्यानुवाद पर राष्ट्रीय वेबीनार

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नरेंद्रनगर। साहित्य में अनुवाद का खास स्थान है। वास्तव में मूल सहित्य के असली मर्म को प्रस्तुत करना अनुवाद की कसौटी होता है।

ये कहना है भारतीय अनुवाद परिषद के निदेशक प्रो. पूरण चंद टंडन का। मौका था शहीद बेलमती चौहान राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी गढवाल के हिन्दी विभाग द्वारा ”साहित्यानुवादः अवसर और चुनौतियाँ“ विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का। वेबीनार में हिन्दी के चोटी के विद्वानों ने शिरकत की।

वेबीनार का शुभारंभ कार्यक्रम की संयोजक एवं महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. सुमिता श्रीवास्तव ने मुख्य अतिथि,मुख्य वक्ता, विशिष्ट वक्ता व समस्त राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिभागियों का स्वागत के साथ हुआ। इस मौके पर प्रो. श्रीवास्तव ने कहा कि स्थानीय साहित्य व संस्कृति के वैश्विक प्रचार व प्रसार में अनुवाद की अहम् भूमिका है। अनुवाद के माध्यम से ही हम व्यापक स्तर पर विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।

मुख्य अतिथि प्रोफेसर पूरन चंद टण्डन ने कहा कि अनुवाद पढ़ना, पढ़ाना, अनुवाद करना व अनुवाद में शोध करना अलग-अलग विधाएं हैं। प्रत्येक विधा के लिए उस क्षेत्र का ज्ञान होना आवश्यक है। अनुवादक मूल साहित्य से भी आगे तक समालोचना के माध्यम से पहुंच सकता है। पर अनुवाद करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह महज केवल शाब्दिक अनुवाद न हो कर मूल साहित्य के असली मर्म को प्रस्तुत कर सके।

मुख्य वक्ता के रूप में डॉ0 हरीश कुमार सेठी, इग्नू नयी दिल्ली ने अनुवाद के तकनीकी पक्षों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि अनुवाद बहुत ही व्यापक क्षेत्र है। विषय के साथ अनुवाद का रूप बदल जाता है। साथ ही विषय के साथ अनुवाद करने वाले शब्द का अर्थ भी बदल जाता है। अतः अनुवादक में विषय, भाषा व सांस्कृतिक समझ होनी चाहिए।

विशिष्ट वक्ता के रूप में डॉ0रमाशंकर सिंह ने अपने सम्बोधन में कहा कि अनुवाद करते समय मूल साहित्य के ऐतिहासिक, सामाजिक व राजनैतिक पृष्ठभूमि की समझ होनी चाहिए। साथ ही मूल लेखक के साथ भी संवाद स्थापित करना चाहिए। इन बातों का ध्यान रखने पर ही अनुवाद की सार्थकता सिद्ध हो पाती है।

विशिष्ट वक्ता के रूप में प्रफुल्ल कुमार सिन्हा ने रेडियो अनुवाद पर अपना वक्तव्य रखते हुए बताया कि भारतीय आकाशवाणी 27 भाषाओं में 150 देशों में प्रसारित किया जाता है। अनुवाद के वजह से ही आकाशवाणीद्वारा भारत विश्व को देख पाता है एवं विश्व भारत को देख पाता है। श्री सिन्हा ने बताया कि भारतीय आकाशवाणी प्रतिदिन विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं व बोलियों में 500 समाचार बुलेटिन प्रसारित करता है।
रेडियो अनुवाद के लिए रेडियो का स्रोता होना आवश्यक है।

रेडियो की भाषा साहित्य की नहीं बल्कि आमजन की भाषा होती है। शोधार्थियों में नेहा कुमारी, तेजस पूनिया, मेघना राय आदि ने भी अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए वेबिनार के आयोजक डॉ. राम भरोसे ने बताया कि देश के विभिन्न राज्यों से इस वेबिनार में प्रतिभागियों ने भाग लिया। साथ ही वेबिनार के विषय की भूमिका प्रस्तुत की। उन्होंने वेबिनार के विषय की आवश्यकता व महत्व पर चर्चा की।

इस मौके पर प्रतिभागियों द्वारा वक्ताओं से प्रश्न पूछे गये। कार्यक्रम के अन्त में महाविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. अरूण कुमार सिंह ने सभी अतिथि वक्ताओं व प्रतिभागियों का धन्यवाद दिया। इस मौके पर डॉ0 पूनम धस्माना, डॉ0 विवेकानन्द भट्ट,डॉ0 मुकेश सेमवाल, डॉ0 बंदना सेमवाल, व नरेन्द्र बिजल्वाण इत्यादि ने सहयोग किया।

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