अस्मिता व अस्तित्व की लड़ाई अभी बाकी है

अस्मिता व अस्तित्व की लड़ाई अभी बाकी है

- in हरिद्वार
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डा. कामना जैन
स्त्री के बिना समाज व संसार की कल्पना नहीं की जा सकती। बढ़ते कोरोना वायरस, भारत-चीन युद्ध, गिरती अर्थव्यवस्था आदि के मध्य यह अत्यंत सुखद समाचार है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक व सामाजिक परिषद (ईसीओएसओसी) की संस्था यूनाइटेड नेशन कमीशन ऑन स्टेटस ऑफ वूमेन(यूएनसीएसडब्ल्यू) में भारत चार साल के लिए सदस्य रूप में चयनित हुआ है।

यह उपलब्धि भारत को अपने सभी प्रयासों में लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता के कारण प्राप्त हुई। खबर का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत ने यह स्थान चीन को हराकर प्राप्त किया है।  गत मई जून से ही भारत व चीन के मध्य तनाव व्याप्त है। भारत द्वारा एक बार और चीन को करारी मात देना निश्चय ही समस्त देशवासियों के लिए गर्व का विषय है । यह तो था इस खबर का राजनीतिक पहलू।चर्चा का महत्वपूर्ण पहलू है स्वयं भारत में लैंगिक समानता , सुरक्षा एवं सशक्तिकरण की स्थिति।

इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वतंत्रता आंदोलन से ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रोत्साहन स्वरूप महिलाओं ने घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर आजादी की लड़ाई में सहभागिता की। स्वतंत्र भारत के संविधान में भी लैंगिक समानता संबंधी प्रावधान स्पष्ट उल्लिखित हैं। संविधान व कानून का आसरा पाकर निश्चित रूप से महिलाओं की स्थिति में व्यापक परिवर्तन आया है । किंतु अभी भी बहुत से प्रश्न अनुत्तरित हैं ,प्रश्न उठता है क्या यह परिवर्तन संतोषजनक है, क्या आज स्त्री ,पुरुष के समतुल्य जीवन जी रही है , क्या समाज ने स्त्री को पुरुष के समकक्ष स्वीकार कर लिया है, क्या आज समाज में स्त्री बेखौफ घर से निकलती है? सभी प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं। जब स्त्री घर में ही सुरक्षित नहीं तो बाहर कैसे हो सकती है।

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो वर्ष 2019 में जारी किए गए आंकड़े बताते हैं की वर्ष 2018 में महिलाओं के प्रति अपराध कुल 3,78,277 हैं , जिनमें से 31.9 प्रतिशत पति व उसके परिजनों द्वारा की गई घरेलू हिंसा संबंधी, 27.6 प्रतिशत शील भंग करने के इरादे से महिला पर हमले की घटना तथा 22.5 प्रतिशत महिलाओं के अपरहण संबंधी घटनाएं हैं ।

बहुत सी लड़कियां लोक लज्जा के भय से बलात्कार की घटनाएं दर्ज नहीं कराती हैं। बलात्कार के कुल दर्ज मामले 34 हजार के लगभग हैं। अर्थात प्रत्येक 15 मिनट में एक बलात्कार और पूरे दिन में औसतन 89 बलात्कार किए जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार की प्रत्येक चौथी पीड़ित नाबालिक है और यह भी प्रकाश में आया है कि 2,780 मामलों में बलात्कारी परिवार से ही संबंधित था।

यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि विभिन्न कानूनों के बावजूद महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं । विवाह के समय भी चाहे लड़की कितनी ही प्रतिभा संपन्न हो किंतु दहेज का दानव उसका पीछा नहीं छोड़ता है। विभिन्न संकल्पों और हस्ताक्षर अभियान के बावजूद भी भारत में 2013-15 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रति हजार पुरुषों पर 900 महिलाएं हैं।बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक लॉकडाउन के दौरान पूरे विश्व में घरेलू हिंसा की घटनाएं 20 प्रतिशत बढ़ी। भारत में नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (एनएएलएसए) द्वारा भारत में संपूर्ण लॉकडाउन प्रारंभ होने से 15 मई के मध्य 28 राज्यों की स्टेट लीगल सर्विस(ैएसएलए) द्वारा एकत्रित आंकड़ों के अनुसार देश भर में घरेलू हिंसा की घटनाएं बढ़ गई थी । जिनमें सर्वाधिक 144 घटनाएं देवभूमि उत्तराखंड , 79 मामले हरियाणा और 69 मामले राजधानी नई दिल्ली के दर्ज किए गए।

इस वर्ष विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक ( जेंडर गैप रिपोर्ट ) वर्ष 2020 के अंतर्गत 153 देशों की महिलाओं की स्थिति का आकलन किया गया । वर्ष 2006 से वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक लगातार जारी किया जा रहा है। इसका तात्पर्य है लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार का अध्ययन निम्न चार आधारों पर किया जाता है-1. आर्थिक भागीदारी और अवसर, 2. शिक्षा के अवसर 3. स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता, 4. राजनीतिक सशक्तिकरण एवं भागीदारी । इस में 153 देशों में भारत का स्थान क्रमशः 144वां, 112वां, 150वां एवं 18वां है।विश्व आर्थिक मंच ने भारत मैं शिशु लिंगानुपात ( 91/100 को भी चिंताजनक बताया है। साथ ही स्पष्ट किया है कि संपूर्ण विश्व में फैली लैंगिक असमानता को दूर करने में अभी 99.5 वर्ष का लंबा समय लगेगा। यह एक कटु सत्य है कि विकसित एवं आधुनिक कहलाने वाला यूरोपीय समाज हो , पर्दा प्रथा व शरीयत के कानूनों का समर्थन करने वाला इस्लामिक समाज हो अथवा यत्र नार्यस्तु पूज्यंते ,रमंते तत्र देवता का उद्घोष करने वाला देश भारत हो, प्रत्येक समाज में स्त्री अभी भी दोयम दर्जे पर ही खड़ी है।

तमाम विपरीत परिस्थितियों को परास्त कर खेलों से लेकर विज्ञान ,साहित्य सेना सब जगह बेटियों ने अथक प्रयासों से अपने लिए जगह बनाई है किंतु समाज की घटिया मानसिकता और असुरक्षा को वह मात नहीं दे पा रही है। दरअसल संकुचित मानसिकता वाला पुरुष समाज स्त्रियों के सह अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। वैश्विक मंच में प्राप्त भारत की इस जीत को अभी कूटनीतिक जीत ही समझें तो ज्यादा बेहतर होगा।  अभी तो समान अवसर के साथ-साथ स्त्री को सुरक्षित वातावरण उपलब्धकराना अधिक महत्वपूर्ण है,जहां उसे अपनी अस्मिता एवं अपने अस्तित्व का मूल्य ना चुकाना पड़े । इस लैंगिक समानता को प्राप्त करने के लिए उसे अभी मीलों सफर तय करना है।

लेखिका हायर एजुकेशन में असिस्टेंट प्रोफेसर है।

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