बच्चों की पुस्तकें व पत्रिकाएं सस्ती होनी चाहिए

बच्चों की पुस्तकें व पत्रिकाएं सस्ती होनी चाहिए

- in अल्मोड़ा
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अल्मोड़ा। बच्चों की पुस्तकें और पत्रिकाएं सस्ती होनी चाहिए। ताकि ये सबकी पहुंच तक हों। साथ ही पाठयक्रम से इत्तर पुस्तकें भी छात्रों के लिए मुहैया कराई जानी चाहिए। इससे पढ़ने की रूचि बढ़ती है।

ये कहना है बाल साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डॉ. दिविक रमेश का। डा. रमेशन बालप्रहरी एवं बाल साहित्य संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा विश्व पुस्तक दिवस के मौके पर स्ट्रीम यार्ड पर ‘पुस्तक और बच्चे’ विषय पर आयोजित ऑनलाइन व्याख्यान में मुख्य के रूप में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि पुस्तकें हमारी दोस्त होती हैं। ये हमेशा हमारे साथ रहती हैं। यात्रा में भी नेट, वैटरी या सिगनल जैसी समस्या पुस्तक प्रेमियों को नहीं होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ई बुक का अपना अलग महत्व है। परंतु अभी भी अलग-अलग कारणों से ई बुक लोगों की पहुंच में नहीं है।

पुस्तकें आज भी हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम से बाहर की पुस्तकें तथा बाल पत्रिकाएं भी बच्चों में पढ़ने की रूचि जाग्रत करती हैं। उन्होंने प्रशन्नता जाहिर की कि आज वैज्ञानिक सोच आधारित बालसाहित्य पर्याप्त मात्रा में बच्चों के लिए तैयार हो रहा है।

डॉ. दिविक रमेश ने कहा कि बालसाहित्य की पुस्तकें बहुत छप रही हैं,बिक भी रही हैं परंतु पुस्तकों तक बच्चों की पहुंच नहीं है। उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए तैयार पुस्तकें और पत्रिकाएं सस्ती होनी चाहिए। सरकार तथा दूसरी संस्थाओं को बच्चों की पुस्तकें तथा पत्रिकाओं के लिए अनुदान देना चाहिए। जिससे पुस्तकें सस्ती हों और बच्चे अपनी जेब खर्च से इन्हें आसानी से खरीद सकें।

उन्होंने कहा कि जन्म दिन या दूसरे मांगलिक अवसरों पर पुस्तकें उपहार में देने की संस्कृति को बढ़ाए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बालसाहित्य केवल बच्चों के लिए नहीं होता है। इसे बड़ों को भी पढ़ना चाहिए।

प्रौढ़ साहित्य में बाल मनोविज्ञान व बच्चों की रुचि को ध्यान में नहीं रखा जाता। इसलिए बच्चे प्रौढ़ साहित्य नहीं पढ़ते परंतु सभी शिक्षकों तथा अभिभावकों को बालसाहित्य पढ़ना चाहिए। दिविक रमेश जी ने प्रारंभ में सफदर हाशमी की कविता ‘किताबें करती हैं बातें’ तथा ‘पुस्तक अपनी नानी दादी’ तथा ‘अच्छी पुस्तक बगिया जैसी’ तीन कविताओं का वाचन कर पुस्तकों के महत्व को बताया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में हिंदी,गुजराती तथा सिंधी भाषा के वरिष्ठ बालसाहित्यकार डॉ. हूंदराज बलवाणी ने कहा कि कोरी सीख देने के बजाय मनोरंजन तथा आनंद देने वाली पुस्तकें बच्चों के लिए तैयार की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्कूलों में समग्र शिक्षा तथा राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत पर्याप्त मात्रा में पुस्तकों की खरीद होती है।

उन पुस्तकों को बच्चों तक पहुंचाने में शिक्षकों व अभिभावकों की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि बच्चे पुस्तकें पढ़ना चाहते हैं परंतु पाठ्यक्रम का बोझ व दूसरे कारणों से अभिभावक उन्हें बालसाहित्य की पुस्तकें एवं पत्रिकाएं नहीं देते।

बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार बालसाहित्य की पुस्तकें तथा बाल पत्रिकाएं पढ़ने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि बतौर साहित्यकार,शिक्षक तथा अभिभावक हम बड़े लोग पठन-पाठन की संस्कृति को बढ़ावा देंगे।

पुस्तकें पढ़ने की आदत को अपने दैनिक जीवन में व्यवहार में लाएंगे तो बच्चे अपने आप पठन-पाठन की संस्कृति से जुड़ेंगे। बालप्रहरी के संरक्षक,साहित्यकार तथा सेवानिवृत्त आयकर आयुक्त श्याम पांडेय ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पुस्तकें कहीं न कहीं हमें मानवीय मूल्यों एवं सामाजिक सरोकारों से जोड़ती हैं।

आर्मी पब्लिक स्कूल अल्मोड़ा के कक्षा 7 के छात्र चैतन्य बिष्ट ने कहा कि मोबाइल फोन पर ‘गेम’ ने बच्चों को किताबों से दूर किया है। उनके अनुसार पुस्तकों से हमें ज्ञान मिलता है। डैफोडिल्स पब्लिक स्कूल कोटा, रायपुर, छत्तीसगढ़ की कक्षा 10 की छात्रा शिवांशी शर्मा ने कहा कि बच्चे अपनी पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते ऊब जाते हैं। पाठ्यक्रम से बाहर की पुस्तकें व पत्रिकाओं की रोचक एवं नई जानकारी बच्चों को अपने पाठ्यक्रम व ज्ञान बढ़ाने में मदद करती हैं।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रांरभ में गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल ज्यौड़िया, जम्मू की कक्षा 12 की छात्रा आशिमा शर्मा ने पुस्तकों के महत्व पर अपनी स्वरचित कविता प्रस्तुत करते हुए कहा पुस्तक में होती नई खोज, पुस्तक से मिलती नई सोच। जो पढ़ता इन्हें लगाकर ध्यान, उन्हें है मिलता भरपूर ज्ञान। बच्चों की है यह प्रिय साथी, जो जीवन भर साथ निभातीं। पुस्तकों से आओ प्रेम करें ,मन मंदिर को ज्ञान से भरें ।

कार्यक्रम के प्रारंभ में बालप्रहरी के संपादक तथा बालसाहित्य संस्थान के सचिव उदय किरौला ने सभी का स्वागत करते हुए कहा कि अपने उत्तराखंड में जब छोटे बच्चे का ’अन्न प्रासन्न’ होता है यानी सबसे पहले बच्चे को अन्न ग्रहण करने को दिया जाता है। तब बच्चे के सामने पैन, पेंसिल, पुस्तक, खिलौने आदि रखे जाते हैं। जब बच्चा सबसे पहले पुस्तक पर हाथ रखता है तब माना जाता है कि बड़े होकर यह खूब पढ़ने-लिखने वाला होगा।

1 Comment

  1. rakesh singh rawat

    ekdum sahi baat boli hai aapne.

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