विश्व हिन्दी दिवसःविश्व में धाक जमाती हमारी हिन्दी

विश्व हिन्दी दिवसःविश्व में धाक जमाती हमारी हिन्दी

- in युवा
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                                                              तंजानिया से डा. श्वेता भट्ठ शर्मा
विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली पांच भाषाओं में से एक हिन्दी हर क्षेत्र में धाक जमा रही है। विश्व बाजार से लेकर विश्व के शैक्षणिक संस्थान हिन्दी को गंभीरता से ले रहे हैं।

10 जनवरी 1975 से शुरू हुआ विश्व हिन्दी दिवस आज 44 साल पूरे कर चुका है। अभी तक 11 विभिन्न देशों में विश्व हिन्दी दिवस के मौके पर बड़े आयोजन हो चुके हैं। इसमें मॉरिशस में तीन बार, यूके, यूएसए, त्रिनिडाड, दक्षिण अफ्रीका हिन्दी दिवस की मेजबानी कर चुके हैं।

10 जनवरी के दिन दुनिया के विभिन्न देशों के स्थित भारतीय दूतावासों में विश्व हिन्दी दिवस धूमधाम से मनाया जाता है। इन शासकीय आयोजनों से इत्तर हिन्दी विश्व स्तर पर खूब धाक जमा रही है। यही वजह है कि विश्व के लोगों में हिन्दी के प्रति जागरूकता बढ़ी है।

स्वतंत्रता के बाद हिन्दी की विश्व फलक पर दशा और दिशा पर नजर डालें तो स्पष्ट है कि हिन्दी साल दर साल लोगों की जुबां पर चढ़ रही है। दुनिया के करीब पांच दर्जन से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी न केवल पढ़ाई जा रही है बल्कि इसमें शोध भी हो रहे हैं।

लोग हिन्दी को समझने को भारत की ओर खिंचे चले आ रहे हैं। इसमें धार्मिक ग्रंथ खास भूमिका निभा रहे हैं। फिजी में हिंदी भाषा को अधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है। जिसे फिजियन हिंदी कहा जाता है। ये हिन्दी की विश्व स्तर पर बड़ी उपलब्धि है।

2017 में पहली बार ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में ’अच्छा’, ’बड़ा दिन’, ’बच्चा’ और ’सूर्य नमस्कार’ जैसे हिंदी शब्दों को भी शामिल किया जा चुका है। तमाम अन्य शब्दों को अब अंग्रेजी में उपयोग हो रहा है। ये क्रम आगे भी जारी रहने वाला है। वास्तव में ये हिन्दी की संपन्नता का प्रतीक है।

मौजूदा दौर में विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली पांच भाषाओं में हिन्दी भी शामिल है। हिन्दी के इसी रूतबे का कमाल है कि बाजार भी हिन्दी को फॉलो करने लगा है। यानि लाभ का साथी बाजार भी हिन्दी की ताकत को समझ चुका है।

विश्व फलक की इन उपलब्धियों से इत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति पर गौर करें तो मन में एक टीस उठती है। देश में हिन्दी अभी भी स्वाभिमान का प्रतीक नहीं बन पाई है। समाज पर हावी अंग्रेजियत और अनेकता में एकता की ठसक के चलते हिन्दी को देश में वो मुकाम हासिल नहीं हो पा रहा है जिसकी वो हकदार है।

रही सही कसर मौजूदा पीढ़ी का अंग्रेजी में डूबने से पूरी हो रही है। यही वजह है कि आजादी के 71 साल बाद भी हिन्दी अनुरागी और शिक्षाविद्ध हिन्दी को राजश्रय की वकालत कर रहे हैं।

 

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